68 – सूरह अल-क़लम

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है।  

यह सूरह नून है। क़लम गवाही देता है और जो कुछ (लिखने वाले उससे) लिख रहे हैं।
के अपने परवरदिगार की इनायत से तुम कोई दीवाने नहीं हो।
और तुम्हारे लिए यक़ीनन वह सिला है जिस पर कभी ज़वाल न आएगा।
और तुम बड़े आला अख़्लाक़ पर हो।
इस लिए अनकरीब तुम भी देख लोगे और वह भी देख लेंगे।
के तुम में से किस गिरोह में है, जो फितने में पड़ा हुआ है।
तुम्हारा परवरदिगार ही बेहतर जानता है के कौन उसकी राह से भटके हुए हैं और वही बेहतर जानता है के कौन राहे रास्त पर हैं। (1-7)

यह सूरह नून है। क़लम गवाही देता है और जो कुछ (लिखने वाले उससे) लिख रहे हैं। कि अपने परवरदिगार की कृपा से तुम कोई दीवाने नहीं हो। और तुम्हारे लिए यक़ीनन बदला है कभी समाप्त न होने वाला। और तुम एक उत्तम चरित्र पर हो। इस लिए जल्द ही तुम भी देख लोगे और वह भी देख लेंगे। कि तुम में से किस गिरोह में है, जो गुमराही में पड़ा हुआ है। तुम्हारा परवरदिगार ही बेहतर जानता है कि कौन उसकी राह से भटके हुए हैं और वही बेहतर जानता है कि कौन सीधे रास्त पर हैं। (1-7)

इसलिए तुम इन झुठलाने वालो की किसी बात पर कान न धरो।
यह तो चाहते हैं के तुम ज़रा नरम पड़ो, फिर यह भी नरम पड़ जायेंगे।
हरगिज़ कान न धरो किसी ऐसे शख़्स की बात पर जो बहुत क़समें खाने वाला है, बेवक़अत है,
इशारेबाज़ है, चुगली लिए फिरता है,
भलाई से रोकता है, हद से बढ़ जाने वाला है,
हक़ मारता है, पत्थर दिल है और इस पर मज़ीद यह के बे-अस्ल भी है।
यह इस बिना पर है के उसके पास बहुत माल है और बेटे हैं।
हमारी आयतें उसे सुनाये तो कहता है: यह तो अगलों के अफसाने है।
(समझता है के वह बड़ी नाक वाला है), इस की यह सूंड हम अनक़रीब दाग़ देंगे। (8-16)

इसलिए तुम इन झुठलाने वालो की किसी बात पर कान न धरो। यह तो चाहते हैं कि तुम ज़रा नरम पड़ो, फिर यह भी नरम पड़ जायेंगे। हरगिज़ कान न धरो किसी ऐसे व्यक्ति की बात पर जो बहुत क़समें खाने वाला है, हीन है, इशारेबाज़ है, चुगली लगाता फिरता है, भलाई से रोकता है, हद से बढ़ जाने वाला है, हक मारता है, पत्थर दिल है और इस से बढ़कर यह कि अपनी वंशावली के बारे में भी ढोंग करता है। यह इस कारण है कि उसके पास बहुत माल है और बेटे हैं। हमारी आयतें उसे सुनाये तो कहता है: यह तो पहले लोगों की कहानियाँ हैं। (समझता है कि वह बड़ी नाक वाला है), इस की यह सूंड हम जल्द ही दाग़ देंगे। (8-16)

हमने इनको उसी तरह इम्तिहान में डाला है, जिस तरह बाग़ वालों को इम्तिहान में डाला था, जब उन्होंने क़सम खायी के वह अपने बाग़ के फल सुबह सवेरे लाज़मन तोड़ लेंगे
और (किसी गरीब और मिसकीन के लिए) कुछ भी न छोड़ेंगे। फिर वह सोये पड़े थे के तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक फिरने वाला उस पर फिर गया।
और उन का वह लहलहाता हुआ बाग़ इस तरह हो कर रह गया जैसे कटी हुई फ़स्ल हो।
चुनाँचे सुबह हुई तो एक दुसरे को पुकारने लगे
के फल तोड़ने हैं तो चलो सवेरे अपने खेत पर पहुंचों।
फिर चल पड़े और आपस में चुपके चुपके कहते थे
के देखना आज कोई मिसकीन तुम्हारे पास बाग़ में आने न पाए।
वह बड़ी ख़ुशी में निकले, इस ख़याल में के सब उनकी दस्तरस में है।
मगर जब बाग़ को देखा तो बोले: हम ज़रूर रास्ता भूल गए!
नहीं, बल्कि महरूम हो कर रह गए।
उन में जो सबसे बेहतर आदमी था, उसने कहा: मैंने तुमसे कहा न था के तुम अपने परवरदिगार की तस्बीह क्यों नहीं करते?
वह पुकार उठे के पाक है हमारा परवरदिगार, बेशक हम ही ज़ालिम थे।
फिर वह आपस में एक-दूसरे को मलामत करने लगे।
बोले: हाय हमारी बद-बख़्ती, हम ही सरकशी में मुब्तला रहे।
बईद नहीं के हमारा रब इस की जगह इससे से बेहतर बाग़ हमें अता फरमा दे, हम अपने रब ही की तरफ लौटें हैं।
(लोगों), इस तरह आएगा अज़ाब और आख़िरत का अज़ाब तो इस से कहीं बढ़कर है। काश, यह लोग इस को जानते! (17-33)

हमने इनको उसी तरह परीक्षा में डाला है, जिस तरह बाग़ वालों को परीक्षा में डाला था, जब उन्होंने क़सम खायी कि वह अपने बाग़ के फल सुबह सवेरे ज़रूर ही तोड़ लेंगे और (किसी गरीब और ज़रूरतमंद के लिए) कुछ भी न छोड़ेंगे। फिर वह सोये पड़े थे कि तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक फिरने वाला उस पर फिर गया। और उन का वह लहलहाता हुआ बाग़ इस तरह हो कर रह गया जैसे कटी हुई फ़स्ल हो। चुनाँचे सुबह हुई तो एक दुसरे को पुकारने लगे कि फल तोड़ने हैं तो चलो सवेरे अपने खेत पर पहुंचों। फिर चल पड़े और आपस में चुपके चुपके कहते थे कि देखना आज कोई ज़रूरतमंद तुम्हारे पास बाग़ में आने न पाए। वह बड़ी ख़ुशी में निकले, इस ख़याल में कि सब उनके नियंत्रण में है। मगर जब बाग़ को देखा तो बोले: हम ज़रूर रास्ता भूल गए! नहीं, बल्कि वंचित हो कर रह गए। उन में जो सबसे बेहतर आदमी था, उसने कहा: मैंने तुमसे कहा न था कि तुम अपने परवरदिगार की स्तुति क्यों नहीं करते? वह पुकार उठे कि पवित्र है हमारा परवरदिगार, बेशक हम ही ज़ालिम थे। फिर वह आपस में एक-दूसरे को दोष देने लगे। बोले: हाय अफ़सोस है हम पर, हम ही विद्रोह पर अड़े रहे। संभवतः हमारा रब इस की जगह इससे से बेहतर बाग़ हमें प्रदान कर दे, हम अपने रब ही की तरफ लौटें हैं। (लोगों), इस तरह आएगा अज़ाब और परलोक की यातना तो इस से कहीं बढ़कर है। काश, यह लोग इस को जानते! (17-33)

उन के लिए जो इस अज़ाब से डरने वाले हैं, उन के परवरदिगार के पास अलबत्ता, राहत के बाग़ हैं।
(तुम समझते हो के यह नहीं होगा) तो क्या हम अपने फ़र्मांबरदार बन्दों को मुजरिमों के बराबर कर देंगे ?
तुम्हें क्या हुआ है, तुम कैसा हुक्म लगाते हो? 
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जिसमें तुम पढ़ते हो
के वहां तुम्हारे लिए वही कुछ है जो तुम पसंद करोगे?
क्या तुम्हारे लिए हम पर कोई क़समें है जो क़यामत तक चली जाएँगी के तुम्हारे लिए वही कुछ है जो तुम हुक्म लगोगे?
इन से पूछो के इनमें से कौन इसका ज़िम्मा लेता है?
क्या इनके (ठेहराए हुए) कोई शरीक हैं (जो इसका ज़िम्मा लेंगे)? तो लाएं अपने इन शरीकों को, अगर यह सच्चे हैं। (34-41)

उन के लिए जो इस अज़ाब से डरने वाले हैं, उन के परवरदिगार के पास अलबत्ता, राहत के बाग़ हैं। (तुम समझते हो कि यह नहीं होगा) तो क्या हम अपने आज्ञाकारी बन्दों को मुजरिमों के बराबर कर देंगे ? तुम्हें क्या हुआ है, तुम कैसा निर्णय करते हो? क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जिसमें तुम पढ़ते हो कि वहां तुम्हारे लिए वही कुछ है जो तुम पसंद करोगे? क्या तुम्हारे लिए हम पर कोई क़समें है जो क़यामत तक चली जाएँगी कि तुम्हारे लिए वही कुछ है जो तुम निर्णय करो? इन से पूछो कि इनमें से कौन इसका ज़िम्मा लेता है? क्या इनके (ठेहराए हुए) कोई साझीदार हैं (जो इसका ज़िम्मा लेंगे)? तो लाएं अपने इन साझीदारों को, अगर यह सच्चे हैं। (34-41)

यह उस दिन को याद रखें, जब बड़ी हलचल पड़ेगी और यह सजदे के लिए बुलाये जायेंगे तो सजदा न कर सकेंगे।
इन की आँखे झुकी होंगी, इन पर ज़िल्लत छा रही होगी। (यह ज़ालिम, इनकी कमर तख्ता होगी), यह उस वक़्त भी सजदे के लिए बुलाये जाते थे, जब यह भले चंगे थे। (42-43)

यह उस दिन को याद रखें, जब बड़ी हलचल पड़ेगी और यह सजदे के लिए बुलाये जायेंगे तो सजदा न कर सकेंगे। इन की आँखे झुकी होंगी, इन पर अनादर छाया होगा। (यह ज़ालिम, इनकी कमर तख्ता होगी), यह उस वक़्त भी सजदे के लिए बुलाये जाते थे, जब यह भले चंगे थे। (42-43)

सो अब मुझे और इन को, जो इस कलाम को झुटला रहे हैं, छोड़ दो। हम इनको वहां से ब-दतरीज (तबाही की तरफ) ला रहे हैं, 
जहाँ से यह नहीं जानते।
और मैं इनको ढील दे रहा हूँ के अपना ज़ोर लगा लें, इसलिए के मेरी तदबीर बड़ी मोहकम है। (44-45)

सो अब मुझे और इन को, जो इस कलाम को झुटला रहे हैं, छोड़ दो। हम इनको वहां से धीरे-धीरे (तबाही की तरफ) ला रहे हैं, जहाँ से यह नहीं जानते। और मैं इनको ढील दे रहा हूँ कि अपना ज़ोर लगा लें, इसलिए कि मेरी योजना बड़ी मज़बूत है। (44-45)

(यह सुनते क्यों नहीं)? क्या तुम इन से कोई मुआवज़ा चाहते हो के यह उसके तावान से दबे जाते हैं?
या इनके पास ग़ैब का इल्म है (के आख़िरत में भी यही सुर्ख़-रू होंगे) और यह उसको लिख रहे हैं?
(नहीं, कुछ नहीं) इस लिए (ऐ पैग़म्बर) तुम अपने परवरदिगार के हुक्म के इंतज़ार में सब्र किये रहो और (अपनी कौम के मामले में) मछली वाले (युनुस) की तरह न हो जाओ, जब उसने (मछली के पेट में) पुकारा और वह ग़म से भरा हुआ था।
उस वक़्त अगर उसके परवरदिगार की इनायत उस के  शामिले हाल न हो जाती तो (अपनी इस उजलत के नतीजे में) मज़्मूम होकर वह उसी चटियल मैदान में पड़ा रहता, (जहां मछली ने उसे उगल दिया था।
लेकिन वह पलटा) तो उस के परवरदिगार ने (अज़-सर-ए-नौ) उस को बरगुज़ीदा किया और उसको अपने सालेह बन्दों में शामिल कर लिया। (46-50)

(यह सुनते क्यों नहीं)? क्या तुम इन से कोई मुआवज़ा चाहते हो कि यह उसके अर्थदंड से दबे जाते हैं? या इनके पास परोक्ष का ज्ञान है (कि आख़िरत में भी यही सफल होंगे) और यह उसको लिख रहे हैं? (नहीं, कुछ नहीं) इस लिए (ऐ पैग़म्बर) तुम अपने परवरदिगार के निर्णय के इंतज़ार में धैर्य रखो और (अपनी कौम के मामले में) मछली वाले (युनुस) की तरह न हो जाओ, जब उसने (मछली के पेट में) पुकारा और वह ग़म से भरा हुआ था। उस वक़्त अगर उसके परवरदिगार की कृपा उस के साथ न हो जाती तो (अपनी इस ज्ल्दबाज़ी के नतीजे में) निन्दित होकर वह उसी चटियल मैदान में पड़ा रहता, (जहां मछली ने उसे उगल दिया था। लेकिन वह पलटा) तो उस के परवरदिगार ने (एक बार फिर) उस को चुन लिया और उसको अपने नेक बन्दों में शामिल कर लिया। (46-50)

(इस लिए सब्र किए रहो) यह मुन्किरीन जब (तुम से) यह याद दिहानी सुनते हैं तो लगता है के अपनी निगाहों के ज़ोर से तुम्हें फिसला देंगे और कहते हैं के यह ज़रूर दीवाना है।
दरां हालाँकि यह तो सारे जहांन वालों के लिए एक याद दिहानी है। (51-52)

(इस लिए धैर्य रखो) यह झुठलाने वाले जब (तुम से) यह याद दिहानी सुनते हैं तो लगता है कि अपनी निगाहों के ज़ोर से तुम्हें फिसला देंगे और कहते हैं कि यह ज़रूर दीवाना है। हालाँकि यह तो सारे जहांन वालों के लिए एक याद दिहानी है। (51-52)

जावेद अहमद ग़ामिदी