70 – सूरह अल-मआरिज

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अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है।

बहुत जल्दी मचाई है एक जल्दी मचाने वाले ने, उस अज़ाब के लिए जो इन मुन्किरों पर आकर रहेगा, उसे कोई हटा न सकेगा। वह अल्लाह की तरफ से आएगा जो उरूज के ज़ीनो वाला है। (यह हर चीज़ को अपने पेमानो से नापते और फिर जल्दी मचा देते हैं। इन्हें बताओ के) फ़रिश्ते और रूह उल-अमीन (तुम्हारे हिसाब से) पचास हज़ार साल के बराबर एक दिन में उस के हुज़ूर चढ़ कर पहुँचते हैं। इसलिए, (ऐ पैग़म्बर) तुम (इन की बातों पर) पुरे हुस्न और वक़ार के साथ सब्र करो। यह उस को दूर समझते हैं। और हम उसे बहुत करीब देख रहे हैं। (1-7)

बहुत जल्दी मचाई है एक जल्दी मचाने वाले ने, उस दण्ड के लिए जो इन झुठलाने वालों पर आकर रहेगा, उसे कोई हटा न सकेगा। वह अल्लाह की तरफ से आएगा जो उत्थान की सीढ़ियों वाला है। (यह हर चीज़ को अपने मापदंडों से नापते और फिर जल्दी मचा देते हैं। इन्हें बताओ कि) फ़रिश्ते और रूह (तुम्हारे हिसाब से) पचास हज़ार साल के बराबर एक दिन में उस के हुज़ूर चढ़ कर पहुँचते हैं। इसलिए, (ऐ पैग़म्बर) तुम (इन की बातों पर) भली तरह का धैर्य करो, शिष्ट धैर्य। यह उस को दूर समझते हैं। और हम उसे बहुत निकट देख रहे है। (1-7)

(यह भी देखेंगे, यहाँ और इस के बाद आख़िरत में भी ) – उस दिन जब आसमान तेल की तलछट की तरह हो जायेगा और पहाड़ धुनी हुई ऊन की तरह होंगे, और कोई सच्चा दोस्त भी (उस वक़्त अपने) किसी दोस्त को न पूछेगा, (इस के बावजूद के) वह एक दुसरे को दिखाए जाएँगे। मुजरिम चाहेगा के वह उस दिन के अज़ाब से बचने के लिए अपने बेटों को, अपनी बीवी को, अपने भाई को, अपने खानदान को जो उसे पनाह देता रहा और रु-ए-ज़मीन के हर शख्स को फ़िदये में दे दे, फिर अपने आप को (उस से) छुड़ा ले। (8-14)

(यह भी देखेंगे, यहाँ और इस के बाद परलोक में भी) – उस दिन जब आसमान तेल की तलछट की तरह हो जायेगा और पहाड़ धुनी हुई ऊन की तरह होंगे, और कोई सच्चा मित्र भी (उस वक़्त अपने) किसी मित्र को न पूछेगा, (यद्यपि) वह एक दुसरे को दिखाए जाएँगे। मुजरिम चाहेगा कि वह उस दिन के अज़ाब से बचने के लिए अपने बेटों को, अपनी पत्नी को, अपने भाई को, अपने कुनबे को जो उसे शरण देता रहा और सम्पूर्ण धरती वालों को बदले में दे दे, फिर अपने आप को (उस से) छुड़ा ले। (8-14)

हरगिज़ नहीं, वह आग की लपट है, चमड़ी उधेड़ती, हर उस शख़्स को पकड़ती हुई जिस ने पीठ फेरी और मुहं मोड़ा और माल जमा किया फिर सैंत सैंत कर रखा। (15-18)

हरगिज़ नहीं, वह आग की लपट है, चमड़ी उधेड़ती, हर उस व्यक्ति को पकड़ती हुई जिस ने पीठ फेरी और मुहं मोड़ा और माल जमा किया फिर सैंत सैंत कर रखा। (15-18)

(यह इसी तरह जल्दी मचाते रहेंगे, तुम इन की परवाह न करो), हकीक़त यह है के इंसान बहुत बे-सब्रा पैदा हुआ है. उस पर जब मुसीबत आती है तो घबरा उठता है और जब राहत मिलती है तो सख़्त बख़ील बन जाता है। हाँ, मगर वह नहीं जो नमाज़ी हैं, जो अपनी नमाज़ की हमेशा पाबंदी करते हैं, जिन के मालों में साइल और महरूम के लिए एक मुक़र्रर हक है, जो रोज़े जज़ा को बरहक़ मानते हैं, जो अपने रब के अज़ाब से डरते रहते हैं इसलिए के उनके परवरदिगार का अज़ाब ऐसी चीज़ नहीं है के उस से कोई निडर हो जाए, जो अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करते हैं अपनी बीवियों और लौंडियो के सिवा, इसलिए के उनके मामले में उन पर कोई मलामत नहीं है। हाँ, जो इसके आगे कुछ चाहें तो वही हद से बढ़ने वाले हैं, जो (ख़ल्क और ख़ालिक़, दोनों के मामले में) अपनी अमानतों और अपने एहद का पास करते हैं, जो अपनी गवाही पर कायम रहते हैं और जो अपनी नमाज़ की हिफाज़त करते हैं। यही हैं जो (बहिश्त के) बागों में होंगे, बड़ी इज्ज़त के साथ। (19-35)

(यह इसी तरह जल्दी मचाते रहेंगे, तुम इन की परवाह न करो), हकीक़त यह है कि इंसान बहुत अधीर पैदा हुआ है। उस पर जब मुसीबत आती है तो घबरा उठता है और जब राहत मिलती है तो बहुत कंजूस बन जाता है। हाँ, मगर वह नहीं जो नमाज़ी हैं, जो अपनी नमाज़ नियमित रूप से अदा करते हैं, जिन के मालों में मांगने वाले और वंचित के लिए एक निश्चित भाग है, जो बदले के दिन पर विश्वास रखते हैं, जो अपने रब के दण्ड से डरते रहते हैं इसलिए के उनके परवरदिगार का दण्ड ऐसी चीज़ नहीं है कि उस से कोई निर्भय हो जाए, जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते हैं अपनी बीवियों और लौंडियो के सिवा, इसलिए के उनके मामले में उन पर कोई दोष नहीं है। हाँ, जो इसके आगे कुछ चाहें तो वही सीमा का उलंघन करने वाले हैं, जो (इंसानों और ईश्वर, दोनों के मामले में) अपनी अमानतों और अपने वचन का पालन करते हैं, जो अपनी गवाही पर जमे रहते हैं और जो अपनी नमाज़ की रक्षा करते हैं। यही हैं जो (स्वर्ग के) बागों में होंगे, बड़े सम्मान के साथ। (19-35)

फिर क्या बात है के (हमारा यह फैसला सुनते ही) यह मुन्कीरीन, दाएं और बाएं से, गिरोह दर गिरोह, तुम पर पिले पड़ रह हैं ? क्या इनमे से हर शख्स यह तवक़्क़ो रखता है के वह राहत भरी जन्नत में दाख़िल कर लिया जायेगा ? (सिर्फ इस लिए के वह दुनिया में बड़ा है)। हरगिज़ नहीं, (यह अपनी बड़ाई पर न इतराएं) हमने इनको उस चीज़ से पैदा किया है जिसे यह जानते हैं। (36-39)

फिर क्या बात है कि (हमारा यह फैसला सुनते ही) यह झुठलाने वाले, दाएं और बाएं से, समूह के समूह में, तुम पर पिले पड़ रह हैं ? क्या इनमे से हर व्यक्ति यह लोभ रखता है कि वह सुख भरे स्वर्ग में प्रवेश पा जायेगा ? (सिर्फ इसलिए कि वह दुनिया में बड़ा है)। हरगिज़ नहीं, (यह अपनी बड़ाई का दंभ न करें) हमने इनको उस चीज़ से पैदा किया है जिसे यह जानते हैं। (36-39)

(यह समझते हैं के हम इन्हें दुबारा पैदा न कर सकेंगे) ? सो नहीं, मैं कसम खाता हूँ उस की जो मशरिक और मग़रिब की तमाम वुसअ’तों का मालिक है, हम इस पर क़ादिर हैं के इनको बदल कर इन से बेहतर पैदा कर दें और हम इस से आजिज़ न रहेंगे। इसलिए (यह नहीं समझते तो) इन्हें छोड़ो. यह बाते बनाये और खेलें, यहाँ तक के अपने उस दिन को पहुँच जाएं जिस की धमकी इन्हें दी जा रही है। जिस दिन यह अपनी कब्रों से बड़ी तेज़ी के साथ भागते हुए निकलेंगे, गोया दौड़ के लिए लगाये हुए निशानों की तरफ भाग रहे हैं। इनकी आँखे झुकी होंगी, इन पर ज़िल्लत छा रही होगी। यह है वह दिन जिस से यह डराए जाते रहे। (40-44)

(यह समझते है कि हम इन्हें दुबारा पैदा न कर सकेंगे)? सो नहीं, मैं कसम खाता हूँ उस की जो पूर्व और पश्चिम के विस्तार का मालिक है, हम इस पर सक्षम हैं कि इनको बदल कर इन से बेहतर पैदा कर दें और हम इस में असमर्थ न रहेंगे। इसलिए (यह नहीं समझते तो) इन्हें छोड़ो. यह बाते बनाये और खेलें, यहाँ तक कि अपने उस दिन को पहुँच जाएं जिस की चेतावनी इन्हें दी जा रही है। जिस दिन यह अपनी कब्रों से बड़ी तेज़ी के साथ भागते हुए निकलेंगे, जैसे दौड़ के लिए लगाये हुए निशानों की तरफ भाग रहे हैं। इनकी आँखे झुकी होंगी, इन पर अपमान छा रहा होगा। यह है वह दिन जिस से यह डराए जाते रहे। (40-44)

– जावेद अहमद ग़ामिदी