लेखक: शेहज़ाद सलीम

अनुवाद: मुहम्मद असजद

आमतौर पर यह माना जाता है कि सभी गैर-मुसलिम काफ़िर हैं जिनको कुरआन[1] में निंदा (मज़म्मत) और दंड के योग्य बताया गया है। यह धारणा सही नहीं है। एक व्यक्ति काफ़िर तब बनता है जब वह सच को पहचान ले और उस पर पूरी तरह आश्वस्त (कायल) हो और उसके बाद भी वह सच को मानने से इनकार कर दे। अब यह काम किसी भी इंसान के लिए संभव नहीं है कि लोगों के मन के अंदर की बात जान ले और यह फैसला कर दे कि कौन व्यक्ति जानते-बुझते इनकार कर रहा है और कौन नहीं क्योंकि सिर्फ अल्लाह की तरफ से सूचना के आधार पर ही किसी व्यक्ति को काफ़िर कहा जा सकता है। जिस समय अल्लाह अपने रसूल दुनिया में भेजा करता था तब वह उन को स्वयं जानकारी पहुंचा दिया करता था, लेकिन आखिरी रसूल मुहम्मद (स.व) के बाद अब कोई किसी के बारे में यह निर्धारित नहीं कर सकता की वह काफ़िर है। क्योंकि अब किसी के पास अल्लाह का सन्देश नहीं आता, “वही” (وحی) की संस्था आखिरी रसूल (स.व) के बाद समाप्त कर दी गयी है। कोई मुसलिम प्रचारक या विद्वान सच को लोगों के लिए रसूल की तरह पेश नहीं कर सकता और ना ही यह फैसला कर सकता है कि कौन सच को जानते-बुझते नकारने का दोषी है। अल्लाह के आखिरी रसूल मुहम्मद (स.व) के बाद, अब यह सिर्फ फैसले के दिन (परलोक/क़यामत) में मालूम होगा कि कोई व्यक्ति काफ़िर था या नहीं।

इस विवरण से साफ़ है कि रसूलअल्लाह (स.व) के समय के बाद दुनिया में मौजूद ईसाई, यहूदी और अन्य धर्मों के मानने वाले लोग वह काफ़िर नहीं हैं जिन की कुरआन कठोर शब्दों में निंदा करता है। जहां तक ईसाइयों का संबंध है तो उनके बारे में यह ध्यान रखना चाहिए कि वह मूल रूप से एकेश्वरवाद (तौहीद) के मानने वाले हैं। हालांकि वह कुछ बहुदेववादी प्रथाओं (मुशरिकाना रस्मों) में शामिल हैं लेकिन उन्होंने बहुदेववाद (शिर्क) को कभी स्वीकार नहीं किया। एक व्यक्ति मुशरिक तब बनता है जब वह बहुदेववाद (शिर्क) को खुल कर स्वीकार कर ले। कोई व्यक्ति अगर यह दावा करता है कि वह एकेश्वरवादी है तो कुछ बहुदेववादी प्रथाओं में शामिल होने के बिना पर उसे बहुदेववादी नहीं कहा जा सकता। इसका कारण है कि यह हो सकता है व्यक्ति गलती कर रहा हो लेकिन उसे अपनी गलती की समझ और अहसास न हो। सभी ईसाइयों ने, चाहे वह आज के समय के हों या ईसा (स.व) के समय से देखें, कभी भी बहुदेववाद को स्वीकार नहीं किया। “ट्रिनिटी” उनके अनुसार एकेश्वरवाद के अनुरूप है। बेशक, मुसलमान इस बात पर उन से सहमत नहीं लेकिन जब तक वह एकेश्वरवाद का दावा करते हैं तब तक सिर्फ यह कहा जा सकता है कि एकेश्वरवाद के दावे के बावजूद वह बहुदेववादी प्रथाओं में शामिल हैं। उनका मामला बिलकुल उस मुसलमान जैसा है जो संतों की कब्रों पर जाकर मन्नतें मांगता है, ऐसे मुसलमान को बहुदेववादी (मुशरिक) नहीं कहा जा सकता बल्कि उसे यह बताया जाना चाहिए की वह एकेश्वरवाद के पालन का दृढ़ता से दावा करता है पर जो कुछ कर रहा है वह एकेश्वरवाद के बिलकुल खिलाफ है। इसी तरह, ईसाइयों को भी बहुदेववादी नहीं कहा जायेगा बल्कि उनकी गलती उन्हें समझाई जाएगी और बताया जायेगा कि जो कुछ वह कर रहे हैं वह एकेश्वरवाद के बिलकुल अनुरूप नहीं है।

ठीक यही वजह है कि कुरआन ने कभी अहल-ए-किताब (ईसाई और यहूदी) को बहुदेववादी (मुशरीकून) नहीं कहा हालांकि उन पर बहुदेववाद के बड़े रूपों में शामिल होने के इलज़ाम थे। कुरआन ने सिर्फ बनी-इस्माइल [2] को बहुदेववादी कहा है क्योंकि वह बहुदेववाद को खुल कर स्वीकार करते थे और उसकी गवाही भी देते थे। वह बड़ी वे दृढ़ता से वकालत करते थे की बहुदेववाद ही ईश्वर का उतारा हुआ धर्म है और मज़बूती से बहुदेववाद के अनुयायी होने का दावा करते थे।

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टिप्पणी 

[1]. उदाहरण के लिए देखें: 10:47, 14:9-14, 40:51, 58:20-21।

[2]. इस्माइल (स.व) के वंशज, अरब वासी