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मुसलमान और संवाद

विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी संवाद की अपेक्षाकृत कुछ-ही पहल मुसलमानों के द्वारा शुरू की गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर मुसलमान धार्मिक मामलों में ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दूरियाँ ख़त्म करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वे उन्हें मुसलमान बनाने में विश्वास रखते हैं और उनके अंदर दूसरे धर्म के मानने वालों से श्रेष्ठ होने का एक गहरा एहसास है।इसलिए आमतौर पर वो दूरियाँ ख़त्म करने के किसी भी संवाद में शामिल होना पसंद नहीं करते हैं।

The Farahi School of Thought – Personalities and Contributions

The Farahi School of Thought Personalities and Contributions By Rehan Ahmad Yousufi Translation- Ammar Bakhsh Preface It has always been the need of our mission that people be introduced to the personalities of the Farahi school of thought. “The Farahi School of Thought – Personalities and Contributions” is an effort to meet this need. Our …

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सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र

आम तौर पर माना जाता है कि पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. के साथ निकाह के वक़्त उम्मुल मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र 6 साल थी। ये निकाह पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. की पहली पत्नी सैय्यदा खदीजा (रज़ि.) की मृत्यु के बाद मक्के में हुआ था। सैय्यदा आइशा (रज़ि.) विदाई इसके तीन साल बाद …

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इस्लाम छोड़ने की सज़ा !

हमारे कानूनविदों (फुक्हा) का मानना है कि स्वधर्म त्याग यानी इर्तेदाद की सज़ा मौत है। हम इस राय को ठीक नहीं मानते। इसका विश्लेषण करते हुए ग़ामिदी साहब लिखते हैं[1]: स्वधर्म त्याग की यह सज़ा एक हदीस को समझने में गलती से पैदा हुई है। यह हदीस ‘अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि.) ने रवायत की है और …

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How Islam abolished slavery

Author: Javed Ahmad Ghamidi Translation: Dr. Shehzad Saleem وَالَّذِينَ يَبْتَغُونَ الْكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًا وَآتُوهُمْ مِنْ مَالِ اللَّهِ الَّذِي آتَاكُمْ –٢٤ :٣٣ And if any of your slaves ask for Mukātabat, accept it give it to them if you know any good in them and [for this] give them out of the …

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औरत की दियत

दियत एक तरह का जुर्माना है जो क़ातिल मरने वाले के खानदान वालों को इस सूरत में अदा करता है जब वह उसे माफ़ कर दें। आमतौर पर माना यह जाता है कि औरत की दियत उससे आधी है जितना एक मर्द की हत्या के मामले होती। अब कुरआन की उस आयत को देखते हैं जिसमें …

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मेरा नाम – जावेद अहमद ग़ामिदी

मेरे नाम का मामला भी अजीब है। वालिदा को जावेद पसंद था। पैदाईश के बाद वालिद अपने शेख़ से दुआ कराने के लिए लेकर गए तो उन्हों ने फ़रमाया: उस का नाम हम दरवेशों के तरीक़े पर होना चाहिए। उसे काकू शाह कहा करो। मैं देख रहा हूँ कि बादशाह उस के पास नियाज़ मंदाना हाज़िर होंगे। मेरी छोटी ख़ाला बरसों वालिदा के पास रही …

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औरत की गवाही

ज़्यादातर फुक्हा (कानूनविदों) की राय में औरत की गवाही (जिन मामलों में उन्हें स्वीकार्य है) मर्द की गवाही के मुक़ाबले में आधी है।[1] वह अपनी इस राय की बुनियाद कुरआन की निम्नलिखित आयत पर रखते हैं: وَاسْتَشْهِدُوا شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ  فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَامْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَدَاءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَاهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَاهُمَا الْأُخْرَىٰ [٢: …

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क़ुरबानी के बदले दान या सदका देना

कुछ लोगों का मानना है कि ईद पर किसी भेड़-बकरी की बलि (क़ुरबानी) करने के बजाय उसके बराबर पैसा दान में दिया जा सकता है। यह धारणा (तसव्वुर) सही नहीं है, इसको ज़रा विस्तार में समझते हैं: हर इंसान जो अल्लाह पर यकीन रखता है, उसके लिए दो दायरों में रिश्ते वजूद में आते हैं। …

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