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ख़ुदा के फ़ैसले !

रसूलों की तरफ़ से इत्मामे हुज्जत1 के बाद अगर उनको और उनके साथियों को ज़मीन के किसी हिस्से में सत्ता मिल जाए तो ख़ुदा का फ़ैसला है कि उनका इन्कार करने वालों के लिए दो ही सूरतें हैं: उनमें अगर मुशरिकीन (बहुदेवतावादी) होंगे तो क़त्ल कर दिए जाएँगे और किसी न किसी दर्जे में तौहीद …

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सूरा फ़ातिहा – अल-बयान

‘‘अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है जिसकी शफ़क़त अबदी है।1
शुक्र2 अल्लाह3 ही के लिये है, आलम का परवरदिगार4 है सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है5 जो रोज़े जज़ा का मालिक है।6
1. यह आयत सूरे तौबा के सिवा क़ुरआन मजीद की हर सूरा के शुरू में बिल्कुल उसी तरह आई है, जिस तरह यहां है। लेहाज़ा यह क़ुरआन की एक आयत तो ज़रूर है और इसकी सूरतों के शुरू में इसी तरह नाज़िल हुई है और अल्लाह तआला के हुक्म से लिखी गई है। लेकिन अपने इस महल में सूरे फ़ातेहा समेत किसी सूरत की भी आयत नहीं है। बल्कि हर जगह सूरे से अलग अपनी एक मुस्तक़िल हैसियत रखती है। (इक़रा अलन्नास का मफ़हूम इसमें अरबियत की रू से पिन्हा है) यानी अल्लाह, रहमान व रहीम के नाम से यह क़ुरआन लोगों को पढ़ कर सुनाओ ऐ पैग़म्बर! चुनांचे इस लिहाज़ से देखिये तो गोया ‘बे’ सनद के मफ़हूम में है और यह क़ुरआन मजीद और नबी सल्लाहो अलैहि वसल्लम से मुताल्लिक़ तौरात की उस पेशनगोई का ज़ुहूर है जिसमें बताया गया है कि आप ख़ुदा का कलाम ख़ुद उसी के नाम से लोगों के सामने पेश करेंगे। (इसतस्ना में है)।

Islam and Sufism

In our tradition, the religion on which the Muslim systems of Khanqahs/Zawiyah/Ribat [1] are established is called Sufism (Tasawwuf) [2]. This religion runs completely parallel to the religion that the Quran presents to mankind. We shall present our views on Tasawwuf in relation to Islam in the following paragraphs. Tauhid From the Quran, we come …

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70 – सूरह अल-मआरिज

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है। बहुत जल्दी मचाई है एक जल्दी मचाने वाले ने, उस अज़ाब के लिए जो इन मुन्किरों पर आकर रहेगा, उसे कोई हटा न सकेगा। वह अल्लाह की तरफ से आएगा जो उरूज के ज़ीनो वाला है। (यह हर चीज़ को अपने पेमानो से …

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69 – सूरह अल हाक़्क़ह

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है। होनी शुदनी! क्या है होनी शुदनी! और तुम क्या जानो के क्या है वह होनी शुदनी ! (1-3) हो कर रहने वाली! क्या है वह हो कर रहने वाली! और तुम क्या जानो कि क्या है वह हो कर रहने वाली ! (1-3)   …

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68 – सूरह अल-क़लम

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है।   यह सूरह नून है। क़लम गवाही देता है और जो कुछ (लिखने वाले उससे) लिख रहे हैं।के अपने परवरदिगार की इनायत से तुम कोई दीवाने नहीं हो।और तुम्हारे लिए यक़ीनन वह सिला है जिस पर कभी ज़वाल न आएगा।और तुम बड़े आला अख़्लाक़ …

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67 – सूरह अल-मुल्क

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है। बहुत बुज़ुर्ग, बहुत फैज़-रसा है, वह (परवरदिगार) जिसके हाथ में आलम की बादशाही है और वह हर चीज़ पर कुदरत रखता है। (वही ) जिसने मौत और ज़िन्दगी को पैदा किया ताकि तुमको आज़माए के तुममें से कौन बेहतर अमल करने वाला है। …

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मुसलमान और संवाद

विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी संवाद की अपेक्षाकृत कुछ-ही पहल मुसलमानों के द्वारा शुरू की गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर मुसलमान धार्मिक मामलों में ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दूरियाँ ख़त्म करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वे उन्हें मुसलमान बनाने में विश्वास रखते हैं और उनके अंदर दूसरे धर्म के मानने वालों से श्रेष्ठ होने का एक गहरा एहसास है।इसलिए आमतौर पर वो दूरियाँ ख़त्म करने के किसी भी संवाद में शामिल होना पसंद नहीं करते हैं।

The Farahi School of Thought – Personalities and Contributions

The Farahi School of Thought Personalities and Contributions By Rehan Ahmad Yousufi Translation- Ammar Bakhsh Preface It has always been the need of our mission that people be introduced to the personalities of the Farahi school of thought. “The Farahi School of Thought – Personalities and Contributions” is an effort to meet this need. Our …

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सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र

आम तौर पर माना जाता है कि पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. के साथ निकाह के वक़्त उम्मुल मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र 6 साल थी। ये निकाह पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. की पहली पत्नी सैय्यदा खदीजा (रज़ि.) की मृत्यु के बाद मक्के में हुआ था। सैय्यदा आइशा (रज़ि.) विदाई इसके तीन साल बाद …

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