इस्लाम

70 – सूरह अल-मआरिज

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है। बहुत जल्दी मचाई है एक जल्दी मचाने वाले ने, उस अज़ाब के लिए जो इन मुन्किरों पर आकर रहेगा, उसे कोई हटा न सकेगा। वह अल्लाह की तरफ से आएगा जो उरूज के ज़ीनो वाला है। (यह हर चीज़ को अपने पेमानो से …

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69 – सूरह अल हाक़्क़ह

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है। होनी शुदनी! क्या है होनी शुदनी! और तुम क्या जानो के क्या है वह होनी शुदनी ! (1-3) हो कर रहने वाली! क्या है वह हो कर रहने वाली! और तुम क्या जानो कि क्या है वह हो कर रहने वाली ! (1-3)   …

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68 – सूरह अल-क़लम

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है।   यह सूरह नून है। क़लम गवाही देता है और जो कुछ (लिखने वाले उससे) लिख रहे हैं।के अपने परवरदिगार की इनायत से तुम कोई दीवाने नहीं हो।और तुम्हारे लिए यक़ीनन वह सिला है जिस पर कभी ज़वाल न आएगा।और तुम बड़े आला अख़्लाक़ …

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67 – सूरह अल-मुल्क

अल्लाह के नाम से जो सरासर रहमत है, जिसकी शफ़क़त अबदी है। बहुत बुज़ुर्ग, बहुत फैज़-रसा है, वह (परवरदिगार) जिसके हाथ में आलम की बादशाही है और वह हर चीज़ पर कुदरत रखता है। (वही ) जिसने मौत और ज़िन्दगी को पैदा किया ताकि तुमको आज़माए के तुममें से कौन बेहतर अमल करने वाला है। …

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मुसलमान और संवाद

विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी संवाद की अपेक्षाकृत कुछ-ही पहल मुसलमानों के द्वारा शुरू की गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर मुसलमान धार्मिक मामलों में ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दूरियाँ ख़त्म करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वे उन्हें मुसलमान बनाने में विश्वास रखते हैं और उनके अंदर दूसरे धर्म के मानने वालों से श्रेष्ठ होने का एक गहरा एहसास है।इसलिए आमतौर पर वो दूरियाँ ख़त्म करने के किसी भी संवाद में शामिल होना पसंद नहीं करते हैं।

सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र

आम तौर पर माना जाता है कि पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. के साथ निकाह के वक़्त उम्मुल मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र 6 साल थी। ये निकाह पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. की पहली पत्नी सैय्यदा खदीजा (रज़ि.) की मृत्यु के बाद मक्के में हुआ था। सैय्यदा आइशा (रज़ि.) विदाई इसके तीन साल बाद …

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इस्लाम छोड़ने की सज़ा !

हमारे कानूनविदों (फुक्हा) का मानना है कि स्वधर्म त्याग यानी इर्तेदाद की सज़ा मौत है। हम इस राय को ठीक नहीं मानते। इसका विश्लेषण करते हुए ग़ामिदी साहब लिखते हैं[1]: स्वधर्म त्याग की यह सज़ा एक हदीस को समझने में गलती से पैदा हुई है। यह हदीस ‘अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि.) ने रवायत की है और …

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अस्र की नमाज़ के बाद सजदा और इबादत

मुसलमानों में आमतौर पर यह माना जाता है कि अस्र की नमाज़ के बाद मग़रिब तक नमाज़ पढ़ना या सजदा करना मना है। यहाँ यह बात साफ़ कर लेनी चाहिए कि रसूलअल्लाह (स.व) की सुन्नत के मुताबिक जिन वक्तों में नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती वह सिर्फ सूरज के निकलने (सूर्योदय) और उसके डूबने (सूर्यास्त) …

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नज़र और मन्नत माँगना

काफी लोग मानते हैं कि नज़र और मन्नत माँगना इस्लाम में एक पसंद किया जाने वाला काम है। मिसाल के तौर पर अल्लाह से अहद (प्रण) करना कि मुराद पूरी होने पर हम एक तय संख्या में रोज़े (उपवास) रखेंगे या एक तय संख्या में नफ्ल (स्वैच्छिक) नमाज़ अदा करेंगे। यहाँ यह बात जान लेना …

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हदीस की व्याख्या

हदीसों की स्वतंत्र व्याख्या

हदीस की व्याख्या (तशरीह) में आम तरीका है कि हर हदीस को स्वतंत्र रूप से समझा जाता है भले ही खबर के अलग-अलग संस्करण हों जिनमें अलग बाते बयान हो रही हों। इसका नतीजा यह निकलता है कि वह पूरी तस्वीर सामने नहीं आ पाती जिसके बारे में हुक्म दिया गया था और अधूरी जानकारी …

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