लेखक: डॉ शहज़ाद सलीम

अनुवाद: मुहम्मद असजद

कुछ आलिम इस राय को रखते हैं कि हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है कि वह जहाँ रह रहा हो वहां इस्लामी रियासत (राष्ट्र) कायम करे और इस्लामी शरीअत लागू करे। इसके लिए वे रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की मिसाल देते है और कहते हैं कि जिस तरह उन्होंने अरब में इस्लामी रियासत कायम की उसी तरह मुसलमानों को भी जहाँ वो रह रहे हों वहां इस्लामी रियासत कायम करनी चाहिए।

यहाँ यह बात समझ लेने वाली है कि न तो कभी रसूलल्लाह (स.व) ने इस्लामी रियासत कायम करने का ज़िम्मा हाथ में लिया और ना कभी अल्लाह ने उनके ऊपर यह ज़िम्मेदारी डाली। असल बात यह है कि अल्लाह का अटल कानून है कि रसूलों के मामले में वह खुद अपने रसूलों को कामयाबी तक पोहचाते हैं और जहाँ भी एक रसूल भेजते हैं वहां उस रसूल को उसके विरोधियों पर गलबा और प्रबलता देते हैं। यही रसूलल्लाह (स.व) के मामले में भी हुआ,जिसे कुछ लोग समझ नहीं पाते।

जो आलिम इस राय को रखते हैं कि रसूलल्लाह (स.व) को इस्लामी रियासत कायम करनी थी वे इस आयत को पेश करते हैं –

هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ

वही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा ताकि उसे और तमाम दीनों पर ग़ालिब करे अगरचे मुशरेकीन बुरा ही (क्यों न) माने। [कुरआन सूरह सफ़्फ़ 61, आयत 9]

अब आयत में आए इन अलफाज “तमाम दीनों की वजह से कुछ लोग ये मतलब निकालते हैं कि सभी मुसलमानों को अपनी अपनी जगहों पर इस्लामी रियासत कायम करने की जद्दोजेहद करना ज़रूरी है। लेकिन आयत को पढिए तो इस में कोई आदेश नहीं है। केवल एक भविष्यवाणी की गई है और वो भी सिर्फ रसूल के लिए।

अगर इस आयत के प्रसंग को देखें तो ये बात साफ़ हो जाती है कि यहाँ अल्लाह के उसी कानून की बात चल रही जिसके मुताबिक अल्लाह का रसूल हमेशा उन लोगो पर ग़ालिब आकर रहता है जो उसको पहचान कर और सच को अच्छी तरह जान लेने के बाद भी झूट पर ही अड़े रहते हैं और रसूल के विरोधी बनते हैं।

إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُوْلَئِكَ فِي الأَذَلِّينَ  كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ

जो लोग ख़ुदा और उसके रसूल से मुख़ालेफ़त करते हैं वह सब ज़लील लोगों में हैं। ख़ुदा ने हुक्म नातिक दे दिया है कि मैं और मेरे पैग़म्बर ज़रूर ग़ालिब रहेंगे बेशक ख़ुदा बड़ा ज़बरदस्त ग़ालिब है। [कुरआन सूरह मुजादिलह 58, आयत 20-21]

मुहम्मद (स.व) को बता दिया गया था कि अगर वे लोग जिनकी तरफ उन्हें भेजा गया है सच को पहचान कर उसको नहीं मानते और झूट पर ही अड़े रहते हैं और रसूल की मुखालेफ़त करते हैं तो अल्लाह अपने रसूल को उनपर कामयाबी देगा और रसूलल्लाह के साथियों को भी ये साफ़ कर दिया गया था कि उन्हें अरब के उन मुशरीकों से जंग भी करनी पड़ेगी जब तक इस्लाम का बोलबाला न हो जाए, इसके साथ ही अरब के मुशरीकों को भी यह साफ़ कर दिया गया था कि अगर वो रसूल का इनकार करते रहे तो उनका भी वही अंजाम होगा जो उनसे पहली कौमो का हुआ जो अपने रसूलों का इंकार करते रहे थे।

قُلْ لِلَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ يَنتَهُوا يُغْفَرْ لَهُمْ مَا قَدْ سَلَفَ وَإِنْ يَعُودُوا فَقَدْ مَضَتْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ  وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ كُلُّهُ لِلَّهِ

(ऐ रसूल) तुम इन काफिरों से कह दो कि अगर वह लोग (अब भी अपनी शरारत से) बाज़ रहें तो उनके पिछले कुसूर माफ कर दिए जाएं और अगर फिर कहीं पलटें तो यक़ीनन अगलों के तरीक़े गुज़र चुके जो, उनकी सज़ा हुई वही इनकी भी होगी। मुसलमानों इन काफ़िरों से लड़े जाओ यहाँ तक कि कोई फसाद (बाक़ी) न रहे और दीन पूरा का पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए। फिर अगर ये लोग (फ़साद से) न बाज़ आएं तो ख़ुदा उनकी कारवाइयों को ख़ूब देखता है। और अगर सरताबी करें तो (मुसलमानों) समझ लो कि ख़ुदा यक़ीनी तुम्हारा मालिक है और वह क्या अच्छा मालिक है और क्या अच्छा मददगार है। [कुरआन सूरह अनफाल 8, आयत 38 से 40]

यह बात भी ध्यान में रख ले कि ऊपर दी गई आयत (61:9) में लफ्ज़ जो इस्तेमाल हुआ है वो है – الْمُشْرِكُونَ, अल्मुश्रिकून।  यह लफ्ज़ कुरआन में खास तौर पर अरब के उस वक़्त के मुशरीकों के लिए इस्तेमाल हुआ है।यानि आयत में आए इन लफ्जों “तमाम दीनों को भी हम आज के वक़्त के नहीं बल्कि उसी वक़्त के मजहबों के लिए इस्तेमाल करेंगे और इस से बिलकुल ये मतलब न निकाला जाए कि मुसलमानों को आज भी सिर्फ इस्लामी रियासत कायम करने के लिए दूसरों के खिलाफ जंग का एलान कर देना है।

 

One Comment

  1. Rehan Khan January 24, 2017 at 10:43 am

    Gud job Mushafiq Bhai! Allah aasaan kare ye baat khaaskarke moulviyon ko Aameen.