लेखक: शेहज़ाद सलीम
अनुवाद: मुहम्मद असजद

हलाला की अवधारणा (तसव्वुर) इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक्हा) का सबसे घृणित और शर्मनाक मुद्दा है। शरीअत के अनुसार, अगर पति अपनी पत्नी को तीसरी बार तलाक दे देता है तो वह दोनों फिर से शादी नहीं कर सकते सिवाय इसके कि पत्नी किसी और से शादी कर ले और किसी कारण वहां से भी उसे तलाक हो जाये। इस क़ानूनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए धोखे और फरेब का यह उपाय निकाला गया और शादी योजना बना कर की जानी लगी कि दूसरा व्यक्ति पत्नी को शादी के बाद तलाक देगा और इस तरह से पहला पति उससे फिर से शादी कर सकेगा।

कानूनविद (फुक्हा) ने इस पर यह शर्त भी लगा दी कि दूसरे व्यक्ति के तलाक देने से पहले यह ज़रूरी है कि उसके पत्नी से शारीरिक संबंध बने। इस धोखे और फरेब की योजना को जिसमें एक महिला की शादी दूसरे व्यक्ति से करायी जाती है ताकि वह शारीरिक संबंध बनाकर उसे तलाक दे और पहला पति क़ानूनी रूप से फिर से उससे शादी कर सके, को धार्मिक भाषा में हलाला कहा जाता है।

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह से योजना बनाना इस्लामी कानून और उसकी भावना से खेलना है। इसके अलावा शारीरिक संबंध बनाये जाने की शर्त रसूलअल्लाह (स.व) की बात और हिकमत (प्रज्ञता) को ठीक से ना समझने की वजह से पैदा हुई है।

इमाम बुखारी द्वारा सूचित हदीस का अगर विश्लेषण किया जाये तो यह साफ़ हो जाता है कि एक महिला ने दूसरे व्यक्ति से शादी सिर्फ इसलिए की ताकि उससे तलाक लेकर वह क़ानूनी तौर पर पहले पति से फिर से शादी कर सके। उसने झूठ बोला की उसका दूसरा पति नपुंसक है और इस आधार पर तलाक मांगी। रसूलअल्लाह (स.व) उसकी योजना समझ गए और विवेक के साथ उससे कहा कि उसकी पहले पति से फिर से शादी तभी जायज़ हो सकती है जब दूसरे पति के साथ संबंध बन जाने के बाद उसे वहां से तलाक हो। इसका मतलब यह था कि अब दूसरा पति तो उसके दावे के मुताबिक नपुंसक था तो संबंध नहीं बना सकता था और ना वह पहले से शादी कर सकती थी, और अगर वह संबंध बन जाने की बात कहती तो दूसरे पति के नपुंसक होने का दावा झूठा साबित हो जाता। रसूलअल्लाह (स.व) ने उस महिला के झूठ बोलने और कानून का मज़ाक बनाने की वजह से उस मामले में ऐसी शर्त लगा दी थी। इस हदीस से भी अगर कोई नतीजा निकल सकता है तो वह हलाला के निषेध (हराम) होने का ही निकल सकता है और कुछ नहीं। यह बात बिलकुल साफ़ है की हलाला करना शरीअत से खेलना और कानून का मज़ाक बनना है।

हदीस इस प्रकार है:

इक्रामाह सूचित करते है की रिफाअ ने अपनी पत्नी को तलाक दी और उसके बाद उसने अब्द अल्-रहमान अल्-कुराज़ी से शादी कर ली।

आयशा (रज़ि.) कहती हैं कि वह हरा कपड़ा पहने उनके पास आयी और अपने पति की शिकायत की और अपनी चोट दिखायीं। जब रसूलअल्लाह (स.व) आये तो आयशा (रज़ि.) ने उनसे सारा मामला बयान किया। इक्रामाह बताते हैं कि उसके पति को मालूम चला तो वह भी अपनी दूसरी बीवी से हुए दो बेटों के साथ रसूलअल्लाह (स.व) के पास आ गया। अपने पति को देखकर उसने अपना कपड़ा हाथ में लटका कर कहा कि मेरी शिकायत सिर्फ यह है कि इसके पास जो कुछ है वह इस [मुलायम] कपड़े से ज़्यादा कुछ नहीं है। इस पर अब्द अल्-रहमान ने कहा “रसूलअल्लाह (स.व) ये झूठ बोल रही है, मैं इसकी सारी [शारीरिक] ज़रूरतें पूरी कर सकता हूँ। सच तो यह है की यह अवज्ञाकारी है और रिफाअ के पास वापिस जाना चाहती है। रसूलअल्लाह (स.व) ने यह सुनकर फरमाया “अगर ऐसा है तो तुम रिफाअ के लिए तब तक वैध नहीं हो सकती जब तक अब्द अल्-रहमान से तुम्हारा संबंध ना बन जाये।” इसके बाद अब्द अल-रहमान के बेटों की तरफ देख कर पूछा कि क्या ये तुम्हारे बेटे हैं ? हाँ में जवाब मिलने पर आप (स.व) ने फरमाया “तुम इस तरह से झूठ बोलती हो [ऐ अब्द अल्-रहमान की पत्नी] । अल्लाह गवाह है ! जितना एक कौवा दूसरे कौवे से मिलता है यह [लड़के] अब्द अल्-रहमान से उससे भी ज़्यादा मिलते हैं।”[2]

 


[1]. देखें: ग़ामिदी, मीज़ान, 451-452

[2]. सही बुख़ारी, भाग.5, 2192, (न. 5487)