आमतौर पर यह माना जाता है कि अल्लाह ने इब्राहिम (स.व) से उनके बेटे की क़ुरबानी मांगी थी। यह तो सही है कि क़ुरबानी से उन्हें बचा लिया गया पर सवाल यह है कि क़ुरबानी आखिर मांगी क्यों गयी थी ?

मामले को समझा जाये तो असल में अल्लाह ने कभी इब्राहीम (स.व) को अपने बेटे की बलि चढ़ाने का हुक्म नहीं दिया था। खुद इब्राहीम (स.व) ने यह समझा कि अल्लाह ऐसा ही चाहता है और यह कदम उठाया, इस मामले में निम्नलिखित बातों पर गौर किया जाना चाहिए:

   1.    इब्राहीम (स.व) ने अपने ख़्वाब (स्वप्न) की बुनियाद पर यह समझा कि उन्हें अपने बेटे की बलि देने का हुक्म दिया गया है। अल्लाह के नबियों के लिए इस तरह के सपने अल्लाह से संपर्क का ज़रिया होते हैं, इन सपनों में जो कुछ उन्हें दिखाया जाता है वह उनकी हिदायत के लिए होता है। हालांकि, उसूल यह नहीं है कि उन सपनों में जो दिखाया गया बिलकुल वैसा ही असल ज़िन्दगी में होना है या वैसा ही मतलब ले लिया जाये बल्कि इन सपनों में सच्चाई को अलामती तौर पर (प्रतीकात्मक रूप)[2] दिखाया जाता है। प्रतीकात्मक रूप में कोई बात पहुँचाना एक असरदार ज़रिया है, लगता यह है कि सच्चाई छुपी हुई है लेकिन जब उस पर गौर किया जाता है तो वह खुल कर सामने आती है। मिसाल के लिए यूसुफ (स.व) के उस सपने को लेते हैं जिसका ज़िक्र कुरआन में हुआ है। उसमें युसूफ (स.व) ने देखा की सूरज, चाँद और ग्यारह सितारे उन्हें सजदा कर रहे हैं। इसका असल मतलब कुरआन में ही सूरेह युसूफ के अंत में बताया गया है कि इससे प्रतीकात्मक रूप में यह दर्शाया गया था कि एक दिन युसूफ (स.व) के ग्यारह भाई और उनके माता-पिता राजा के रूप में उनकी सत्ता स्वीकार करेंगे (12:100)। इस तरह की और भी मिसाले कुरआन से दी जा सकती हैं।

   2.    अब सवाल यह आता है कि इंसानी बलि का क्या प्रतीकात्मक मतलब हो सकता है? पहले उतरी किताबों से मालूम होता है कि इंसानी की बली का प्रतीकात्मक मतलब है किसी इंसान को अल्लाह की सेवा में पूरी तरह से समर्पित कर देना। उदाहरण के लिए हारून (स.व) की संतान को इबादतगाह की सेवा में सौंप दिया गया था। अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए जब कभी ज़रूरत पड़ी तब उन्हें पशु-बलि के सारे अनुष्ठानों से खुद गुज़रना पड़ा:

तुम्हें लेवीवंश के लोगों को यहोवा के सामने लाना चाहिए और इस्राएल के लोग अपना हाथ उन पर रखेंगे। तब हारून लेवीवंश के लोगों को परमेश्वर के सामने लाएगा वह परमेश्वर के लिए भेंट के रूप में होंगे। इस ढंग से लेवीवंश के लोग परमेश्वर का विशेष कार्य करने के लिए तैयार होंगे।

“लेवीवंश के लोगों से कहो कि वह अपना हाथ बैलों के सिर पर रखें। एक बैल परमेश्वर को पापबलि के रूप में होगा। दूसरा बैल परमेश्वर को होमबलि के रूप में काम आएगा। यह भेंटे लेवीवंश के लोगों को शुद्ध करेंगी।  लेवीवंश के लोगों से कहो कि वह हारून और उसके पुत्रों के सामने खड़े हों। तब यहोवा के सामने लेवीवंश के लोगों को उत्तोलन भेंट के रूप में प्रस्तुत करो। यह लेवीवंश के लोगों को पवित्र बनायेगा। यह दिखायेगा कि वह परमेश्वर के लिये विशेष रीति से इस्तेमाल होंगे। वह इस्राएल के अन्य लोगों से भिन्न होंगे और लेवीवंश के लोग मेरे होंगे।

“इसलिए लेवीवंश के लोगों को शुद्ध करो और उन्हें परमेश्वर के सामने उत्तोलन भेंट के रूप में प्रस्तुत करो। जब यह पूरा हो जाए तब वह आ सकते हैं और मिलापवाले तम्बू में अपना काम कर सकते हैं। (गिनती, 8:10-15)

इसी तरह से जब भी किसी को इस तरह से पवित्र करके परमेश्वर की सेवा में सौंपा जाता था तो उसका पहली संतान होना ज़रूरी था।[3]

यह लेवीवंशी इस्राएल के वह लोग हैं जो मुझको दिये गए हैं। मैंने उन्हें अपने लोगों के रूप में स्वीकार किया है। बीते समय में हर एक इस्राएल के परिवार में पहलौठा पुत्र मुझे दिया जाता था किन्तु मैंने लेवीवंशी के लोगों को इस्रएल के अन्य परिवारों के पहलौठे पुत्रों के स्थान पर स्वीकार किया है। इस्राएल का हर पुरुष जो हर एक परिवार में पहलौठा है, मेरा है। यदि यह पुरुष या जानवर है तो भी मेरा है। मैंने मिस्र में सभी पहलौठे बच्चों और जानवरों को मार डाला था। इसलिए मैंने पहलौठे पुत्रों को अलग किया जिससे वह मेरे हो सकें। अब मैंने लेवीवंशी लोगों को ले लिया है। मैंने इस्राएल के अन्य लोगों के परिवारों में पहलौठे बच्चों के स्थान पर इनको स्वीकार किया है। (गिनती, 8:16-18)

दूसरे शब्दों में कहें तो अल्लाह की इच्छा असल में यह थी कि इब्राहीम (स.व) अपनी पहली संतान इस्माइल (स.व) को उस खास मकसद के लिए समर्पित कर दें जो अल्लाह ने उनके लिए चुना था।

   3.    इब्राहीम (स.व) अल्लाह की आज्ञापालन (इताअत) का ऐसा जज़्बा रखते थे कि उन्होंने अपने ख़्वाब की ताबीर या उसके प्रतीकात्मक रूप को समझने के बजाये उसे बिलकुल वैसा ही सच कर दिखाना चाहा जैसा देखा था। इसीलिए अल्लाह ने उनसे फ़रमाया कि उन्होंने “ख़्वाब को हक़ीकत कर दिखाया”। उन्हें अपने बेटे को बलि चढ़ाने के लिए नहीं कहा गया था, हालांकि अल्लाह ने उनके इस जज़्बे को ख़ूब पसंद किया। उन्होंने यह मानते हुए कि यही अल्लाह की मर्ज़ी है, खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।

 

– शेहज़ाद सलीम
  अनुवाद: मुहम्मद असजद​​​​


[1]. यह लेख इमाम हमीदुद्दीन फ़राही के स्पष्टीकरण पर आधारित है।
[2]. symbolic representation.
[3]. यहाँ यह भी मालूम होता है कि इस्माइल (स.व) ही इब्राहीम (स.व) और उनकी पत्नी हाजरा की पहली संतान थे।