ज़्यादातर लोग तलाक़ देने का सही तरीका नहीं जानते और आमतौर पर यह माना जाता है कि तीन बार तलाक़ बोल देने पर तलाक़ हो जाती है और पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाता है। यह धारणा कुरआन के विरुद्ध (खिलाफ) है। कुरआन में तलाक़ का तरीक़ा विस्तार से दिया गया है और वह इस तरह नहीं है।
इसके अलावा और भी ग़लतफ़हमियाँ हैं जिनकी वजह से तलाक़ के बारे में यह सवाल पैदा होते  हैं:

(1) क्या महिलाओं को तलाक़ का अधिकार है?
(2) क्या पत्नी को तलाक़ लेने के लिए पैसे का भुगतान करना चाहिए?
(3) तलाक़ का सही तरीका क्या है?
(4) गलत तरीके से दिए गए तलाक़ के मामले को कैसे हल किया जाना चाहिए?
(5) तलाक़ के बाद बच्चों की ज़िम्मेदारी किसे दी जानी चाहिए?

तलाक़ का अधिकार

एक आदमी और औरत जब शादी करते हैं तो उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही होती है कि उनका रिश्ता हमेशा सलामत रहे और बदलते वक़्त के साथ उनके एक-दूसरे से किए गए वादे और प्रतिबद्धता में कभी कोई बदलाव ना आये। सिर्फ मौत ही उन्हें इस दुनिया में जुदा करे। लेकिन फिर भी, कभी-कभी हालात ऐसे बन जाते हैं जब अलग हो जाना ही एक रास्ता नज़र आता है और मतभेद इतने साफ हो जाते हैं कि रिश्ते को खत्म करना ज़रूरी हो जाता है। अगर ऐसे हालात बन जाते हैं तो पति-पत्नी को स्थायी रूप से (हमेशा के लिए) अलग हो जाना चाहिए। इस्लाम इस अलगाव के लिए विशेष प्रक्रिया (खास तरीका) देता है जिसको इस्लामी शब्दावली में तलाक़ कहा जाता है। इसके अनुसार मर्द और औरत दोनों को तलाक़ का बराबरी का अधिकार है। फर्क सिर्फ इतना है कि पति पत्नी को तलाक़ देता है और पत्नी पति से तलाक़ मांगती है। कुरआन की आयतों में जैसे की إِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ  ٦٥:١ – जब तुम [लोग] अपनी पत्नियों को तलाक़ दो (65:1), पति को तलाक़ का सर्जक (शुरू करने वाला) बताया गया है। इसके अलावा, कुरआन ने पति के धन और उपहार वापिस कर तलाक़ मांगने के लिए निम्नलिखित शब्दों का इस्तेमाल किया है:

فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ  ٢: ٢٢٩ 

अगर तुम्हें लगे कि वह अल्लाह की तय की गयी सीमाओं पर कायम नहीं रहेंगे तो [पति की दी हुई] उन चीज़ों के मामले में उन दोनों पर कोई गुनाह नहीं  है जो औरत मुआवज़ा में देकर तलाक़ हासिल कर ले । (2:229)

इन शब्दों से साफ़ हो जाता है कि शरीअत में पति को तलाक़ का अधिकार दिया गया है, लेकिन अगर पत्नी चाहे तो वह भी तलाक़ मांग सकती है। यदि पति तलाक़ देने से मना कर देता है तो पत्नी को अधिकार है कि वह मामले को अदालत में ले जाये। उसके बाद मामला अदालत के फैसले से तय होगा।
अक्ल इस बात की मांग करती है कि यह खास अधिकार परिवार के मुखिया के पास होना चाहिए। चूंकि, कुरआन के अनुसार पति को मुखिया बनाया गया है इसलिए यह अधिकार भी उसी को दिया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह अधिकार किसी को मर्द या औरत होने की बुनियाद पर नहीं बल्कि परिवार में उसकी हैसियत की वजह से उसे दिया जाता है। अगर पत्नी मुखिया के कार्य के लिए ज़्यादा उपयुक्त (मुनासिब) होती और उसे परिवार का मुखिया बनाया गया होता तो यह अधिकार फिर उसका होता।

क्या पत्नी को तलाक़ लेने के लिए पैसे का भुगतान करना चाहिए?

आम गलतफ़हमी है कि अगर पत्नी तलाक़ चाहे तो उसे तलाक़ के वक़्त पति को कुछ धन देना चाहिए। कुरआन में इस बात का कोई आधार (बुनियाद) नहीं है बल्कि इसके विपरीत कुरआन में कहा गया है कि पति को तलाक़ के वक़्त पत्नी से ऐसी कोई भी मांग करने की अनुमति (इजाज़त) नहीं है। हालांकि, इसके लिए दो अपवाद (रियायत) है: एक तो यह हो सकता है कि पति ने पत्नी को बहुत सा धन और संपत्ति उपहार में दे रखा है और उसे डर है कि तलाक़ देने पर वह यह सब खो देगा, कुरआन में आता है कि पत्नी अगर चाहे तो फिर वह उस माल में से कुछ या पूरा पति को वापस करके तलाक़ चाहे तो इसमें कोई हर्ज नहीं।
यह बिलकुल साफ़ है कि यह एक अपवाद है और आम हालात में यह उसूल नहीं है, जैसा कि माना जाता है। इसकी अनुमति तब दी गयी है जब धन और संपत्ति खो देने के डर से पति तलाक़ ना दे रहा हो।
कुरआन में आता है:

وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا مِمَّا آتَيْتُمُوهُنَّ شَيْئًا إِلَّا أَن يَخَافَا أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ  ٢: ٢٢٩ 

और तुम्हारे लिए यह जायज़ नहीं [इस मौके पर] कि तुमने जो कुछ इन औरतों को दिया है, उसमें से कुछ भी वापस लो, सिवाय इसके कि पति और पत्नी दोनों को लगे कि वह अल्लाह की तय की गयी सीमाओं पर कायम नहीं रह सकेंगे। अगर तुम्हें लगे कि वह अल्लाह की तय की गयी सीमाओं पर कायम नहीं रहेंगे तो [पति की दी हुई] उन चीज़ों के मामले में उन दोनों पर कोई गुनाह नहीं है  जो औरत मुआवज़ा में देकर तलाक़ हासिल कर ले । (2:229)

दूसरे, अगर पत्नी यौन दुराचार (बदकारी) की साफ़ तौर पर दोषी हो, क्योंकि बदकारी शादी की बुनियाद ही खत्म कर देती है। इस तरह के मामले में पति को इजाज़त दी गयी है कि वह पत्नी को दिये गए उपहार या धन उससे वापस ले सकता है।
कुरआन में आता है:

وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا بِبَعْضِ مَا آتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّا أَن يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ وَعَاشِرُوهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ فَإِن كَرِهْتُمُوهُنَّ فَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَيَجْعَلَ اللَّهُ فِيهِ خَيْرًا كَثِيرًا وَإِنْ أَرَدتُّمُ اسْتِبْدَالَ زَوْجٍ مَّكَانَ زَوْجٍ وَآتَيْتُمْ إِحْدَاهُنَّ قِنطَارًا فَلَا تَأْخُذُوا مِنْهُ َيْئًا أَتَأْخُذُونَهُ بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُّبِينًا وَكَيْفَ تَأْخُذُونَهُ وَقَدْ أَفْضَىٰ بَعْضُكُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ وَأَخَذْنَ مِنكُم مِّيثَاقًا غَلِيظًا  ٤: ١٩-٢١ 

ईमान वालों, तुम्हारे लिए जायज़ नहीं है कि ज़बरदस्ती औरतों के वारिस बन जाओ और ना यह जायज़ है कि [निकाह कर लेने के बाद] जो कुछ तुमने उनको दिया है , उसका कुछ हिस्सा वापिस लेने के लिए उन्हें तंग करो।  हाँ, इस सूरत में कि वह कोई खुली बदकारी करें. और अगर एक बीवी कि जगह दूसरी बीवी ले आने का इरादा कर लो और तुमने उनमें से किसी को ढेरों माल भी दे रखा हो तो उसमें से कुछ वापिस ना लो। क्या तुम इलज़ाम लगा कर और हक़ छीन कर उसे लोगे ? और किस तरह लोगे, जबकि तुम एक दूसरे से संबंध बना चुके हो और वह तुमसे सख्त वचन ले चुकी है।  (4:19-21)

 

तलाक़ की प्रक्रिया (तरीका)

अगर पति ने पत्नी को तलाक़ देने का फैसला कर लिया है तो उसे पहले पत्नी के मासिक धर्म (हैज़) पूरा होने तक इंतज़ार करना चाहिए और आगे शारीरिक संबंध बनाये बिना सिर्फ एक बार ही तलाक़ बोलना चाहिए। पत्नी को जब इस तरह तलाक़ दे दिया जाये तो उसे तीन मासिक धर्म की अवधि तक पति के ही घर में रहना है। इस अवधि को “इद्दत” कहा जाता है। अगर औरत को उम्र, बीमारी या किसी और वजह से मासिक धर्म नहीं होता पर गर्भधारण (हमल) होने की संभावना है तब उसे तीन महीने इंतज़ार करना चाहिए।

गर्भवती महिला के लिए यह अवधि (मुद्दत) बच्चे के पैदा होने तक है, और नए शादीशुदा जोड़े, जिनमें अभी कोई शारीरिक संपर्क ही नहीं हुआ, में तलाक़ होती है तो इस स्थिति में पत्नी के लिए इद्दत की कोई ज़रूरत नहीं है। कुरआन के अनुसार, इद्दत की अवधि का मूल कारण (बुनियादी वजह) यह पता लगाना है कि पत्नी गर्भवती है या नहीं ताकि बच्चे के बारे में कोई शक ना रहे कि वह किस खानदान से है। एक दूसरा फायदा इसका यह है कि पति और परिवार के बाकी सदस्यों को हालात सुधारने का एक मौका मिल जाता है, ऐसे हालात में जहां जज़्बात और भावों का तेज़ बहाव हो वहां कभी-कभी हालात की बेहतरी के लिए वक़्त की ही ज़रूरत होती है।

इद्दत की अवधि के दौरान:

I. पति पत्नी को अपने घर से नहीं निकाल सकता सिवाय इसके कि वह खुली अश्लीलता और बदकारी की दोषी हो, ना ही पत्नी खुद पति का घर छोड़ सकती है।
II. पत्नी अगर गर्भवती हो तो उसे यह बात छिपानी नहीं चाहिए।
III. पति पत्नी का खर्चा और बाकी की ज़िम्मेदारी पहले की तरह उठाता रहेगा।
IV. पति अगर चाहे तो अपना फैसला बदल सकता है। कुरआन के अनुसार इसके लिए सिर्फ इतना करना है कि वह अपने फैसले पर दो लोगों को गवाह कर ले।[2]

इद्दत की इस अवधि के बाद पति अपने तलाक़ के फैसले पर कायम रहता है तो फिर पत्नी हमेशा के लिए उससे अलग हो जाएगी। इसके बाद वह आज़ाद है और अगर किसी और से शादी करना चाहे तो इसके लिए भी उसे पूरा हक़ हासिल है और इसमें कोई रुकावट खड़ी नहीं करनी चाहिए। अगर दोनों के बीच हालात बदल जाएं तो वह फिर से अपने पहले पति से भी शादी कर सकती है। कुरआन ने ज़ोर देकर यह बात कही है कि अलग होने के इस मौके पर पति के लिए जायज़ नहीं कि वह पत्नी को दी गयी कोई संपत्ति या उपहार वापस ले।[3] यहां यह बात ध्यान रहे कि यह हुक्म सिर्फ महर के बारे में नहीं है बल्कि पत्नी को दिए गए हर उपहार के बारे में यही हुक्म है कि वह वापस नहीं लिया जा सकता। सिर्फ इतना ही नहीं कि पति को कुछ वापस नहीं लेना बल्कि उसे चाहिए कि विदाई के इस मौके पर अपने पास से पत्नी को कुछ और भी दे। अगर ऐसा मामला हो गया है कि महर तय नहीं हुए हैं तब भी पति के लिए बेहतर है कि अपने पास से कुछ दे दिया जाये और अगर महर तय हो गए हैं लेकिन पति-पत्नी के संपर्क में आने से पहले ही तलाक़ हो गयी है तब पति को आधी रकम देनी होगी सिवाय इसके कि पत्नी अपनी इच्छा से महर छोड़ दे। इस मामले में भी बेहतर यही है कि वह पत्नी को पूरी रकम देकर विदा करे।

हालांकि, अगर पति इद्दत के दौरान ही अपना फैसला बदल लेता है तो फिर से शादी करने की ज़रूरत नहीं है, इस स्थिति में उन्हें पति-पत्नी ही माना जाएगा। इस तलाक़ के रद्द होने के बाद अगर फिर से बुरे हालात बन जाते हैं और पति अपनी पत्नी को फिर से तलाक़ देने का इरादा कर लेता है तो कुरआन के अनुसार वह तलाक़ देने का अपना अधिकार दूसरी बार भी इस्तेमाल कर सकता है। इस बार भी पत्नी से अलग होने के लिए एक बार ही तलाक़ बोलेगा। इसके बाद फिर से तलाक़ के बाद की इद्दत अवधि उसी तरह से शुरू होगी। फिर से अगर पति चाहे तो इस अवधि के दौरान वह अपना फैसला बदल सकता है जिसके बाद तलाक़ रद्द हो जाएगी और वह फिर से पति और पत्नी होंगे। अगर बदकिस्मती से, तीसरी बार फिर से ऐसी स्थिति आ जाती है कि तलाक़ के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता तो कुरआन अनुसार तीसरी बार भी पति एक बार तलाक़ बोलकर अपना तलाक़ का अधिकार इस्तेमाल कर सकता है। तीसरी बार इद्दत की अवधि शुरू होगी और पति ही पत्नी का खर्चा उठाएगा (हालांकि यह ज़रूरी नहीं की दोनों साथ ही रहें), इस बार इद्दत की अवधि पूरी होने के बाद पत्नी पति से हमेशा के लिए अलग हो जाएगी और इन तीन तलाक़ के बाद अब पति उससे फिर से शादी नहीं कर सकता सिवाय इसके कि उस महिला की किसी और व्यक्ति से शादी हो जाये और वहां से भी उसको किसी वजह से तलाक़ हो जाये – लेकिन यह पहले से तय करके, योजनाबद्ध तरीके से नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से पैदा हुई परिस्थितियों (हालात) के कारण हो। ऐसा इसलिए है कि लोग शादी-तलाक़ को बच्चों का हंसी-खेल ना बना दें।
कुरआन के शब्दों में:

الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ  ٢: ٢٢٩ 

यह तलाक़ [जिसमें पति इद्दत के दौरान अपना फैसला बदल सकता है] सिर्फ दो बार है, फिर या तो औरत को भले तरीके से रोक लेना है या फिर अच्छे ढंग से जाने देना है। (2:229)

इस विवरण से साफ़ है कि कुरआन सिर्फ एक बार बोलकर तलाक़ देने को काफी समझता है और इस बात पर ज़ोर देता है कि एक शादी में पति को तीन बार तलाक़ देने का अधिकार है। कुरआन एक ही बार में तीन बार तलाक़ देने की बिलकुल इजाज़त नहीं देता। नतीजतन यह बात भी साफ़ हो जाती है कि तलाक़ के दो तरीके जो प्रचलित (आम) है: (1) एक ही बार में तीन तलाक़ बोल देना, और (2) तीन अलग-अलग महीनों में तीन बार तलाक़ बोल देना, कुरआन के हुक्म पर आधारित नहीं हैं, कुरआन में ऐसी कोई बात नहीं है। जब रसूलअल्लाह (स.व) को पता चला कि किसी व्यक्ति ने अपनी पत्नी को एक के बाद एक तीन तलाक़ एक ही बार में बोल दीं तो आप (स.व) गुस्से में खड़े हुए और फरमाया:

मैं तुम्हारे बीच उपस्थित (मौजूद) हूँ, और अल्लाह की किताब के साथ ऐसा हंसी-खेल का रवैया अपनाया गया।[4]

 

गलत तरीके से दिए गए तलाक़ के मामले में कार्यवाही

तलाक़ का हुक्म शरीअत में किस तरह है यह उपर बयान हो गया है, लेकिन निर्धारित (तय) कानूनों और प्रक्रियाओं के मामले में अकसर ऐसे हालात सामने आ जाते है जब एक व्यक्ति सही प्रक्रिया से हट जाता है और कानून तोड़ने का दोषी बन जाता है। इंसान का स्वभाव ऐसा है कि जज़्बात में बहकर अल्लाह की तरफ से दिखाए गए रास्ते से भटक जाता है पर इस तरह इंसान की गलती को शरीअत का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। इस तरह का हर मामला कानून का उल्लंघन माना जाएगा और यह देश के विधान-मंडल (कानून साज़ इदारों) के ऊपर है कि वह इस तरह के मामलों के लिए कानून बनाए।
कई बार ऐसा भी होता है कि इस तरह के मामलों में फैसला अदालत पर छोड़ दिया जाता है और यह भी हो सकता है कि देश का विधान-मंडल या संसद कानून बना दे कि ऐसे मामलों में अदालत को क्या फैसला करना है।
तलाक़ के मामलों में विभिन्न उदाहरणों को ध्यान में रखते हुए, गलती दो तरह की होती हैं:
I. पति अपनी पत्नी को मासिक धर्म के दौरान तलाक़ दे देता है या मासिक धर्म के बाद पत्नी से संबंध बना कर तलाक़ दे देता है।
II. पति तीन तलाक़ एक बार में ही बोल देता है।

जहाँ तक पहले मामले का सवाल है एक इस्लामी हुकूमत पति से अपना फैसला रद्द करके तलाक़ सही समय पर सही तरीके से देने के लिए कह सकती है।
रसूलअल्लाह (स.व) ने अपने ज़माने में अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ि.) के मामले में ऐसा ही किया था। जब उन्हें बताया गया की अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ि.) ने अपनी पत्नी को मासिक धर्म के दौरान तलाक़ दे दी है तो आप (स.व) बड़े नाराज़ हुए और फरमाया:

उससे कहो कि अपनी पत्नी को विवाह में तब तक के लिए वापस ले जब तक मासिक धर्म पूरा नहीं हो जाता और उसके बाद यह एक बार और पूरा नहीं हो जाता। इसके बाद वह चाहे तो पत्नी को विवाह में रखे या बिना संबंध बनाये तलाक़ दे, क्योंकि यह इद्दत की वह अवधि है जिसका ध्यान तलाक़ देते हुए रखने के लिए [ईमान वालों को] अल्लाह ने हुक्म दिया है।[5]

दूसरी तरह के मामलों में, तलाक़ के आदेश पर गौर करते हुए तीन समाधान हो सकते हैं:

I. पति को अदालत में बुलाकर दी गयी तलाक़ के बारे में सवाल किए जायें: अगर वह कहता है कि उसने गुस्से में अपने फैसले पर ज़ोर देने के लिए तीन बार बोल दिया या उसे यही जानकारी थी कि तलाक़ देने का सही तरीका यही है और अदालत उसके बयान से संतुष्ट (मुतमईन) हो जाती है तो वह पति-पत्नी को फिर से एक साथ कर सकती है। दूसरी तरफ अगर पति यह कहता है कि उसने यह जानते-बुझते हुए कि वह अपने तीनों अधिकार एक ही बार में इस्तेमाल कर रहा है तीन बार तलाक़ बोला है तो फिर पत्नी उससे अलग हो जाएगी। रुकानह इब्न अब्दी यज़ीद (रज़ि.) के मामले में रसूलअल्लाह (स.व) ने इसी तरह फैसला किया था।[6]

II. दूसरा समाधान यह हो सकता है कि एक राज्य यह देखते हुए कि तलाक़ के मामले में लोगों ने लापरवाही का रवैया अपनाया हुआ है, यह कानून बना दे कि तीन बार तलाक़ बोलना तीन तलाक़ माना जाएगा चाहे फिर वह गुस्से में दी जाये या फिर आम हालात में दी जाये। इस समाधान का एक उदाहरण उमर (रज़ि.) के खिलाफत के दौर में मिलता है। उन्होंने यह देखते हुए कि लोगों ने तलाक़ के मामले में बड़ी लापरवाही का रवैया अपनाया हुआ अपनी सभा (शूरा) से विचार-विमर्श करने के बाद सज़ा के तौर पर यह लागू कर दिया कि तीन तलाक़ एक साथ बोलने पर यह माना जायेगा कि पति तलाक़ के सारे अधिकार इस्तेमाल कर चुका और पत्नी हमेशा के लिए अलग हो जाएगी।

III. इस मामले में तीसरा समाधान यह हो सकता है कि यह देखते हुए के ज़्यादातर लोग सही तरीका नहीं जानते और अज्ञानता में यह मानते हैं कि तीन बार तलाक़ बोलना ही सही तरीका है, राज्य ऐसा कानून बना दे कि तीन बार बोलने पर एक ही तलाक़ मानी जाएगी।

मुसलमानों की भलाई को देखते हुए इन तीनों में से कोई भी समाधान अपनाया जा सकता है। हालांकि, दूसरे और तीसरे समाधान को अपनाते हुए यह ज़रूरी है कि उनके लिए पहले कानून बनाया जाये, जहां तक पहले समाधान की बात है तो उसके लिए पहले से कोई कानून बनाने की ज़रूरत नहीं है और मामला अदालत के फैसले पर छोड़ा जा सकता है।

नाबालिग़ बच्चों का संरक्षण

तलाक़ के बाद बच्चों के संरक्षण के मामले पर शरीअत में कोई हुक्म नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यह बच्चों की भलाई के ऊपर छोड़ दिया गया है। विवाद होने पर अदालत यह देखते हुए कि बच्चों के लिए क्या बेहतर होगा इसका फैसला करेगी।
शरीअत में शायद इस पर कोई फैसला इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि हर मामले में हालात अलग-अलग होते हैं।

 

-शेहज़ाद सलीम
अनुवाद: मुहम्मद असजद


[1]. प्रस्तुत स्पष्टीकरण: जावेद अहमद ग़ामिदी, मीज़ान, 438-460
[2]. यह गवाही, जैसा की कुरआन से मालूम होता है कोई क़ानूनी ज़रूरत नहीं है बल्कि पति-पत्नी की भलाई के लिए कुरआन ने एक अच्छी नसीहत कर दी है।
[3]. इसमें अपवाद सिर्फ यह है कि पत्नी खुले दुराचार और बदकारी की दोषी हो तो फिर पति पर कुछ गुनाह नहीं की वह अपनी संपत्ति और उपहार वापस ले।
[4]. नसाई अल-सुनन अल-मुजतबा सं.2 भाग.6, 142, (न. 3401)
[5]. सही बुख़ारी, भाग.5, 2011, (न. 4953)
[6]. अबू दाउद सुनन भाग. 2, 263, (न.2206)