लोग आम तौर पर यह मानने लगे हैं कि इस्तिखारे के ज़रिये वह किसी भी मामले में यकीनी तौर पर अल्लाह की मर्ज़ी जान सकते हैं। यहाँ तक कि इसके लिए वह पेशेवर इस्तिखारे करने वाले के पास भी जाते हैं। यह बात समझने की ज़रूरत है कि इस्तिखारा और कुछ नहीं बल्कि अल्लाह से की जाने वाली एक प्रार्थना, एक दुआ है। इसमें अल्लाह से उन मामलों में मार्गदर्शन (रहनुमाई) की दुआ की जाती है जिनमें फैसला करना मुश्किल हो जाता है। रसूलअल्लाह (स.व) की यह दुआ कितनी ज़बरदस्त है यह इसके लफ़्ज़ों से पता चलता है:

ऐ अल्लाह मैं तुझसे तेरे इल्म (ज्ञान) के साथ भलाई मांगता हूँ, और तेरी कुदरत के साथ कुव्वत (सामर्थ्य) मांगता हूँ और तुझसे तेरे अज़ीम फज़ल (आशीष) का सवाल करता हूँ, इसलिए कि तू ताक़त रखता है मैं ताक़त नहीं रखता। और तू सब कुछ जानता है और मैं नहीं जानता, और तू गैब (अप्रत्यक्ष) का जानने वाला है। ऐ अल्लाह, अगर तेरे इल्म में यह बात है कि यह काम [जिसको में करने का इरादा रखता हूँ] मेरे लिए मेरे दीन, मेरी दुनिया और मेरी आखिरत के लिए बेहतर है तो इसे मेरे मुकद्दर में कर दे और मेरे लिए इसको आसान कर दे फिर मेरे लिए इसमें बरकत डाल दे। और अगर तेरे इल्म में यह बात है कि यह काम मेरे लिए मेरे दीन, मेरी दुनिया और आखिरत के लिए बुरा है तो इसे मुझसे दूर कर दे और मुझे इससे दूर कर दे, और मेरे मुकद्दर में भलाई रख दे जहाँ भी हो और फिर मुझे उस पर राज़ी कर दे[1]

अब हर दुआ की तरह यह भी अल्लाह के इल्म और हिकमत पर है कि वह इस पर क्या फैसला करता है, वह चाहे तो किसी इशारे, किसी ज़रिये से रास्ता दिखा दे चाहे तो किसी वजह के चलते देरी करा दे। इसलिए इस बात को बिलकुल साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि इस्तिखारा सिर्फ एक दुआ है और यह अल्लाह की मर्ज़ी पक्के तौर पर जान लेने की कोई विधि या नुस्खा नहीं है।

लोग यह भी मानते हैं कि इस्तिखारे के बाद सिर्फ सपनों के ज़रिये ही अल्लाह की इच्छा का संकेत मिल सकता है। इसी ग़लतफहमी की वजह से लोग समझते हैं कि सिर्फ ख़्वाब ही वह ज़रिया हैं जिनसे किसी मामले में अल्लाह की मर्ज़ी जानी जा सकती है। लेकिन, असल में अल्लाह को अगर कोई इशारा देना ही हो तो उसके बहुत से तरीके हो सकते है, और ख़्वाब उनमें से एक हैं। यह भी हो सकता है कि अल्लाह किसी को भेज दे जो फैसला लेने में मदद कर दे, या फिर हालात ऐसे बन जाएं कि सही रास्ता अपने आप साफ हो जाये। या फिर अल्लाह चाहे तो सीधे कोई संकेत इंसान के दिल में डाल दे।

हालांकि, ज़रिया कोई भी हो, यह ज़रूरी है कि अगर कोई संकेत, कोई बात ऐसी हो जो दीन या अक्ल के विरुद्ध (खिलाफ) जाती हो तो उसे कभी नहीं मानना चाहिए। इंसान को हमेशा अक्ल और विवेक से काम लेना चाहिए क्योंकि अल्लाह की तरफ से इंसान को सबसे बड़ी रहनुमाई यही है। जब कहीं से कोई रहनुमाई ना मिल रही हो तो मुमकिन है कि सपने के ज़रिये कोई संकेत मिल जाये पर ज़रूरी यह है कि सपनों से मतलब वही निकाला जाये जो इल्म, अक्ल और तजुरबे (अनुभव) के विरुद्ध ना हो, और अगर विरुद्ध हो तो फिर सपने की उस व्याख्या (ताबीर) को नज़रअंदाज़ कर दिया जाना चाहिए।

 

– शेहज़ाद सलीम
  अनुवाद: मुहम्मद असजद​


[1]. सहीह बुख़ारी, भाग.1, 391, (न.1109)।