ख़ुदा के फ़ैसले !

रसूलों की तरफ़ से इत्मामे हुज्जत1 के बाद अगर उनको और उनके साथियों को ज़मीन के किसी हिस्से में सत्ता मिल जाए तो ख़ुदा का फ़ैसला है कि उनका इन्कार करने वालों के लिए दो ही सूरतें हैं: उनमें अगर मुशरिकीन (बहुदेवतावादी) होंगे तो क़त्ल कर दिए जाएँगे और किसी न किसी दर्जे में तौहीद के मानने वाले (एकेश्वरवादी) होंगे तो महकूम (अधीनस्थ) बना दिए जाएँगे। सूरः बकरः, अनफ़ाल और तौबा2 में अल्लाह तआला ने जिस क़िताल3 की हिदायत की है और अरब के मुशरिकीन (बहुदेवतावादी) के जिस क़त्ले आम का हुक्म दिया है वो इसी फ़ैसले का निफ़ाज़ (enforcement) है। इसका शरीअत (धर्म-विधान) और उसके अहकाम (आदेशों) से कोई सम्बन्ध नहीं है। चुनांचे अपनी किताब “मीज़ान” में हम ने लिखा है:

“….ये महज़ क़िताल न था बल्कि अल्लाह तआला का अज़ाब (सज़ा) था जो इत्मामे हुज्जत के बाद सुन्नते-इलाही (ईश्वरीय विधान) के बिल्कुल मुताबिक़ और ख़ुदा के फ़ैसले की हैसियत से पहले अरब के मुशरिकीन (बहुदेवतावादी), यहूदियों और ईसाईयों पर और उसके बाद अरब के बाहर की क़ौमों पर नाज़िल किया गया। लिहाज़ा ये बिल्कुल स्पष्ट है कि अच्छी तरह जानने-बूझने के बावजूद सत्य का इन्कार करने वालों के ख़िलाफ़ जंग और उसके नतीजे में हारे हुए लोगों पर जज़िया लगा के उन्हें महकूम (अधीनस्थ) बना कर रखने का हक़ इसके बाद हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है। क़यामत तक कोई शख्स अब न दुनिया की किसी क़ौम पर इस मक़सद से हमला कर सकता है और न किसी मफ्तूह (पराजित) को महकूम (अधीनस्थ) बना कर उस पर जज़िया लगा सकता है। मुसलमानों के लिए क़िताल की एक ही सूरत बाकी रह गई है और वो ज़ुल्म-ओ-उदवान (अत्याचार और आक्रमण) के ख़िलाफ़ जंग है। अल्लाह की राह में क़िताल अब यही है। इसके सिवा किसी मक़सद के लिए भी दीन के नाम पर जंग नहीं की जा सकती।“ (599)

इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़ुर्रियत (वंश) के बारे में भी ख़ुदा का फ़ैसला है कि वो अगर धर्म के रास्ते पर चलें और ईश्वर के संदेश को बिना किसी बदलाव के और पूरी विश्वसनीयता के साथ दुनिया की सब क़ौमों तक पहुंचाते रहें तो उनका इंकार करने वालों पर उन्हें विजय प्राप्त होते रहेगी लेकिन अगर वे पथभ्रष्ट और धर्म-विमुख हो जाएँ तो ईश्वरीय सज़ा के रूप में उन्हीं इन्कार करने वालों के अधीन बना दिए जाएँगे और अपमानित (ज़लील) किये जाएँगे। ख़ुदा के ये वादा बनी-इस्राईल (पैग़म्बर याक़ूब के वंशज) और बनी-इस्माईल (पैग़म्बर इस्माईल के वंशज) दोनों के साथ है। कुरान में स्पष्ट रूप से ये बात मौजूद है कि ख़ुदा के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के लिए बनी-इस्माईल भी उसी तरह चुने गए जिस तरह उन से पहले बनी-इस्राईल चुने गए थे।4 लिहाज़ा जो वादे बनी-इस्राईल के लिए तौरात5 में बताए गए हैं और क़ुरआन ने जगह-जगह जिनका हवाला दिया है6 वो बनी-इस्माईल के लिए भी लागू होंगें। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो इसके लिए ख़ुद कोई पहल कर सकते हैं और दुनिया की किसी क़ौम पर इस मक़सद के लिए हमलावर हो सकते हैं। हरगिज़ नहीं, इसका हक़ न उन्हें तौरात में दिया गया है और न क़ुरआन में। इस वादे का ज़हूर (प्रागट्य) वक़्त के साथ धीरे-धीरे होता है और इसके असबाब (कारण) भी वक़्त के साथ बनते चले जाते हैं। उनका काम सिर्फ़ ये है कि ख़ुदा के सब हुक्मों पर अमल करें और अपने सामर्थ्य की सीमा तक ख़ुदा के पैग़ाम को लोगों तक पहुँचाने का काम पूरी सच्चाई और ईमानदारी से करते रहें जिसके लिए ख़ुदा ने उन्हें चुन लिया है।

इस फ़ैसले की एक शाख ये भी है कि फ़लस्तीन और उसके आस-पास का इलाक़ा अल्लाह ने बनी-इस्राईल के लिए और अरब प्रायद्वीप का इलाक़ा बनी-इस्माईल के लिए ख़ास कर कर दिया है ताकि दुनिया की सब कौमें के साथ उनका  भाईचारे सुलूक़ हो और लोग इससे हिदायत पाएं। चुनांचे बनी-इस्राईल को इसलिए ये आदेश दिया गया कि अपनी मीरास (विरासत) के इस इलाक़े को वहां के रहने वालों से ख़ाली करा लें, उसमें किसी काफ़िर और मुशरिक को ज़िन्दा न छोड़ें और न उसकी सरहदों से लगे हुए किसी इलाक़े में काफ़िरों और मुशरिकों की कोई हुकूमत कायम रहने दें या जब तक कि वो उनके बाज-गुज़ार (करदाता) न बन जाएँ। वो अगर इससे इंकार करें तो उनके मर्दों को क़त्ल कर दिया जाए और उनकी औरतों और बच्चों को ग़ुलाम बना लिया जाए। तौरात के भाग-5 किताब-ए-इस्तेसना (व्यवस्था-विवरण) के अध्याय-20 में ये हुक्म पूरे विस्तार से बताया गया है। पैग़म्बर सुलेमान ने इसी आदेश के अनुसार मलिका-ए-सबा को अपने अधीन आने के लिए मजबूर किया था। मक्का विजय के बाद अरब प्रायद्वीप में मुशरिकीन (बहुदेवतावादी) के सब माबद (देव-स्थान) इसी हुक्म के तहत ख़त्म किये गए।   “لايجتمع دينان في جزيرة العرب”  (अरब प्रायद्वीप में दो दीन जमा नहीं हो सकते)7 की हिदायत भी इसी के तहत है। चुनांचे अरब की धरती पर न तो अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और की परस्तिश के लिए कोई इबादतगाह बनाई जा सकती है और न ही किसी काफ़िर और मुशरिक को यहाँ रहने बसने की इजाज़त दी जा सकती है। ये सब आदेश एकेश्वरवाद के इस केन्द्र यानि केवल अरब प्रायद्वीप से ही सम्बन्धित हैं। इनका दुनिया के किसी दूसरे इलाके से कोई सम्बन्ध नहीं है।

ये ख़ुदा के ख़ास फ़ैसले हैं और आसमानी ग्रंथों में बड़े विस्तार से इनके बारे में बताया गया है। तौरात में भी इनकी पूरी व्याख्या की गयी है क़ुरआन में भी। मुसलमानों की बदकिस्मती है कि आज के समय में उनके बड़े विद्वान् भी इन फैसलों की सही नौइयत (प्रकृति) समझने में असमर्थ हैं। इस्लाम की सियासी-ताबीर (राजनैतिक व्याख्या) भी इसी ग़लतफ़हमी के कारण पैदा हुई है, जिसका नतीजा इस सियासी-ताबीर के प्रभाव से शुरू होने वाले जिहादी आंदोलनों की शक्ल में मुसलमानों की पूरी उम्मत (वैश्विक मुस्लिम समाज) भुगत रही है। वर्तमान परिस्थितियों के सुधार के लिए ज़रूरी है कि ख़ुदा के इन फैसलों को ज्ञान की सतह पर समझने और समझाने की कोशिश की जाए ताकि किसी चरमपंथी व्यक्ति या सन्गठन के लिए इन फैसलों की ग़लत व्याख्या कर फ़ित्ना (अराजकता और हिंसा) फ़ैलाने की कोई गुंजाईश न रहे। 

जावेद अहमद ग़ामिदी
अनुवाद: जुनैद मंसूरी

1 – “ इत्मामे हुज्जत” का अर्थ होता है ख़ुदा के पैग़म्बर द्वारा ख़ुदा के संदेश को उन लोगों तक जिनके लिए वह भेजा
गया है, स्पष्ट रूप से आख़िरी हद तक इस प्रकार पहुंचा देना कि लोगों को कोई संदेह बाकी न रहे।
2 – सूरः बकरः 2:190-194, सूरः अनफ़ाल 8:38-40, सूरः तौबा 9:3-5, 29
3 – “क़िताल” का अर्थ होता है इत्मामे हुज्जत के बाद पैग़म्बर और उनके सन्देश का जानते-बूझते हुए इन्कार करने वालों
के साथ ईश्वर के आदेश पर युद्ध करना।
4 – सूरः हज 22:78
5 – क़ुरआन की ही तरह ईश्वर ने पैग़म्बर मूसा को जो किताब प्रदान की उसे तौरात कहा जाता है। बाइबल में शुरू के 5 भाग
(उत्पत्ति, निर्गमन, लैव्यवस्था, गिनती और व्यवस्था-विवरण) में वही तौरात किताब है।
6 – तौरात का भाग-5 व्यवस्था-विवरण के अध्याय-28 में सूक्त 1 से 25 तक और क़ुरआन की सूरः नम्बर 2 अल- बकरः की
आयत 40 एवं सूरः नम्बर 17 बनी-इस्राईल की आयत 8 में इसका वर्णन है।
7 – हदीस की किताब अल-मुअत्ता: 2607