मेरे नाम का मामला भी अजीब है। वालिदा को जावेद पसंद था। पैदाईश के बाद वालिद अपने शेख़ से दुआ कराने के लिए लेकर गए तो उन्हों ने फ़रमाया: उस का नाम हम दरवेशों के तरीक़े पर होना चाहिए। उसे काकू शाह कहा करो। मैं देख रहा हूँ कि बादशाह उस के पास नियाज़ मंदाना हाज़िर होंगे। मेरी छोटी ख़ाला बरसों वालिदा के पास रही थीं। वालिद और वालिदा, दोनों उन से बहुत मुहब्बत करते थे। उन  के एक बेटे मुझसे तीन साल बड़े थे जिनका नाम उन्होंने “रफ़ीक़” रखा था। इस की मुनासबत से उनका आग्रह था कि मेरा नाम शफ़ीक़ रखा जाये। वो उस के सिवा कोई दूसरा नाम क़बूल करने के लिए तैयार ना थीं। इस के कुछ दिनों बाद बड़ी ख़ाला देखने के लिए आई तो उन्हों ने फ़रमाया: मैंने तो पहले से इस का नाम काका मुहम्मद रखा हुआ है। अब क्या किया जाये? मेरे घर वालों ने इस का आसान हल ये तलाश किया कि तमाम नाम क़बूल कर लिए। चुनांचे ये बुज़ुर्ग जब तक ज़िंदा रहे, मुझे अपनी पसंद के नामों से पुकारते रहे।

मदरसे में दाख़िले का वक़्त आया तो वालिद मौजूद ना थे। उस ज़माने में अक्सर वो महीनों के लिए अपने शेख़ की ख़ानक़ाह कोटली मुग़लां चले जाते थे। उन के एक अज़ीज़ दोस्त थे जिन्हें हम चचा कहते थे। वालिद की ग़ैर मौजूदगी में वो मुझे दाख़िल कराने गए। मेरे लिए उसी स्कूल का इंतिख़ाब (चुनाव) किया गया जिसमें मेरे ख़ालाज़ाद भाई रफ़ीक़ पढ़ते थे। नाम लिखाते वक़्त चचा ने मुझसे पूछा तो मैंने सारे नाम बता दिए। वो सख़्त परेशान हुए कि अब फ़ैसला किस तरह किया जाये। उन्होंने रफ़ीक़ की तरफ़ देखा तो उस ने कहा: हमारे घर में तो इसे शफ़ीक़ ही कहते हैं। चचा ने चंद लम्हों के लिए रुके और फिर यही नाम स्कूल के रजिस्टर में दर्ज करा दिया।

मैं जब शऊर की उम्र को पहुंचा तो मुझे वालिदा का रखा हुआ नाम ज़्यादा पसंद आया, लेकिन अब स्कूल के रजिस्टर का क्या किया जाये? अपने एक उस्ताद मुहम्मद सादिक़ साहिब से बात की तो उन्होंने फ़रमाया: उस मरहले पर नाम तबदील करना तो मुश्किल होगा। तुम्हें शेर कहने का शौक़ है। मेरा सुझाव ये है कि जावेद तख़ल्लुस कर लो। मैं तुम्हारा नाम शफ़ीक़ अहमद जावेद लिख देता हूँ। तुम्हें शफ़ीक़ पसंद नहीं तो अपना क़लमी नाम जावेद अहमद भी रख सकते हो। मुझे ये तजवीज़ (सलाह) पसंद आई। दोस्त अहबाब पहले ही जावेद के नाम से पुकारते थे। चुनांचे कॉलेज के ज़माने से इसी नाम की शौहरत हो गई। बाद में पहचान कार्ड और पासपोर्ट वग़ैरह बनाने का मौक़ा आया तो सब जगह यही नाम लिखा गया।

मैं ग़ालिबन नौवीं क्लास में था कि अपने एक फूफीज़ाद भाई की शादी में शिरकत के लिए लाहौर आया। यहां मुझे पहली मर्तबा दस पंद्रह दिन तक बड़े चचा मुहम्मद लतीफ़ ख़ानसाहब के साथ रहने का मौक़ा मिला। उन्हें अपने वालिद और मेरे दादा नूर इलाही साहिब से इश्क़ की हद तक मुहब्बत थी। रात-दिन वो मुझे उन के क़िस्से सुनाते और बताते थे कि गांव में तुम्हारे दादा एक मुसलेह (समझौता करवाने वाले) की हैसियत से जाने जाते थे। उन की नेकी, ख़ुदातरसी और दानाई की वजह से लोग अपने झगड़े चुकाने के लिए उन की तरफ़ रुजू करते और उनका हर फ़ैसला मान लेते थे। उन की बातों ने मुझे बेहद मुतास्सिर (प्रभावित) किया। ये तास्सुर इतना शदीद (प्रबल) था कि मैं हर वक़्त दादा के बारे में सोचता, यहां तक कि कई दिन तक सोता तो ख़्वाब में भी उन्ही को देखता था।

इस मौक़ा पर ख़ानदान के एक दूसरे बुज़ुर्ग और बच्चों के लिए दीनी किताबों के मुसन्निफ़ (लेखक) मक़बूल अनवर साहब दाऊदी से मुलाक़ात हुई। इन की ये निसबत हमारे गांव दाऊद की वजह से थी। वैसे मेरे वालिद का पूरा नाम भी मुहम्मद तुफ़ैल जुनैदी था, लेकिन कई बार कोई चीज़ अचानक मुतवज्जे (ध्यान आकर्षित) कर लेती है। दाऊदी साहब से मिलने के बाद पहली मर्तबा मुझे ख़्याल हुआ कि मेरे नाम के साथ भी इस तरह का कोई इज़ाफ़ा होना चाहिए। लड़कपन में ऐसी ख़्वाहिशें कई मर्तबा आदमी के ज़हन पर सवार हो जाती हैं। में भी दिन रात यही सोचता। एक दिन वालिद साहब से इस मौज़ू (विषय) पर बात हुई तो उन्होंने मक़बूल साहिब की इत्तिबा (अनुकरण) में “दाऊदी” का इज़ाफ़ा कर लेने की सलाह दी। फिर फ़रमाया: हमारे शेख़ से बैअत कर लेते तो जुनैदी भी हो सकते थे। उधर मेरी ख़्वाहिश थी कि ये निसबत दादा से हो। चचा से जो कुछ सन चुका था, उस की बिना पर अब मेरे लिए वही आईडीयल थे। मैं उन से निसबत के लिए सोचता तो “नूरी” और “मुसलही” के अलफ़ाज़ ज़हन में आते थे, लेकिन ज़ौक़ उन्हे क़बूल करने के लिए तैयार नहीं होता था। इसी उलझन में था कि दो बुज़ुर्ग हमारे यहाँ मेहमान हुए। वालिद साहब का तरीका था कि आमतौर पर महीनों के लिए सैलानी फ़क़ीरों, अति़ब्बा और सन्यासियों को अपने यहाँ मेहमान ठहरा लेते थे। ये लोग भी इसी तरह आए। इन में से एक वालिद के पीर भाई ग़ुलाम रसूल वहशी और दूसरे कोई आलिम  और सन्यासी थे जिनका नाम अबदुल्लाह था। वहशी बहुत अच्छे कातिब थे। उन्हों ने अपने शेख़ की किताब लैला मजनू अपने हाथ से लिखी थी। वो उसे सुनाते और इस की शरह-ओ-वज़ाहत (व्याख्या) में तसव्वुफ़ के असरार ओ रमूज़ बयान करते थे। अबदुल्लाह साहिब की दिलचस्पी अरब जाहिली की तारीख़ से थी। वो उस के वाक़ियात वालिद को सुनाते थे। मैं इन बुज़ुर्गों की मजलिस में घंटों बैठता और बड़ी दिलचस्पी के साथ उन की बातें सुनता था। अबदुल्लाह साहिब ने इन्ही मजलिसों में कोई क़िस्सा सुनाते हुए बयान किया कि बनू ग़ामिद के बुजुर्गो ने सदीयों पहले किसी मुआमले पर पर्दा डाला और इस तरह इसलाह-ए-अहवाल (सुलाह) की कोशिश की थी। चुनांचे इसी बुनियाद पर उन्हें ग़ामिद का लक़ब दिया गया और “ग़मद अल अम्र” के अलफ़ाज़ उस के बाद अरबी ज़बान में “असलाह अल अम्र” के मअनी में इस्तेमाल होने लगे। उन्होंने बताया कि ये क़बीला जज़ीरा नुमा अरब में इसी निसबत से ग़ामिदी कहलाता है। मुझे फ़ौरन ख़्याल हुआ कि यही काम तो मेरे दादा करते थे। इस के लिए ये नई ताबीर —- बेहद ख़ुशी हुई। वालिद से ज़िक्र हुआ तो उन्होंने भी पसंद किया। मैं ज़िला साहीवाल के जिस देहाती माहौल में रहता था, वहां इस तरह का नाम मज़ाक़ बन जाता। इस लिए मैंने उसे लिखना तो बहुत बाद में शुरू किया, लेकिन उसी दिन फ़ैसला कर लिया कि ये लफ़्ज़ अब मेरे नाम का हिस्सा बन जाएगा।

बचपन , लड़कपन और युवाकाल की खुशियाँ भी अजीब होती हैं। बाद में सोचते हैं तो हैरत होती है कि किस चीज़ ने इल्म-ओ-अमल और फ़िक्र-ओ-ख़्याल में क्या अहमियत हासिल कर ली थी। दादा के साथ निसबत के लिए ये लफ़्ज़ मिल जाने से जो ख़ुशी मुझे उस वक़्त हुई, उसे में आज भी लफ़्ज़ों में बयान नहीं कर सकता। वक़्त किस तरह बदलता है, अब बड़ी से बड़ी बात भी दिल-ओ-दिमाग़ में इस तरह की कोई ख़ुशी पैदा नहीं करती। ऐसी सब चीज़ें उम्र के साथ किस क़दर बेमानी हो जाती हैं:


हर रोज़ एक ताज़ा जहां की हिकायतें
अब रह गई हैं क़िस्सा-ए-अहद शबाब में


[2007 ईo]

 

मक़ामात अध्याय – 1 (अनुवाद – आक़िब ख़ान)



* इस के बाद लुग़त (शब्दकोश) की किताबें देखीं तो इस की पुष्टि हुई। चुनांचे “अकरब अल मवारिद”  में है: (غامدۃأبو قبیلۃ ینسب إلیھا الغامدیون، وقیل: ھو غامد وإسمہ عمرو ولقب بہ لإصلاحہ أمرًا کان بین قومہ۔