इस्लाम के सिवा बाक़ी तमाम मज़हबों के मानने वालों को ग़ैर-मुस्लिम कहा जाता है। यही शब्द/परिभाषा उन लोगों के लिए भी है जो किसी दीन या मज़हब को नहीं मानते। ये कोई अपमान का शब्द नहीं है, बल्कि सिर्फ इस वास्तविकता का इज़हार है कि वो इस्लाम के मानने वाले नहीं हैं। उन्हें आम तौर पर काफ़िर भी कह दिया जाता है, लेकिन हमने अपनी किताबों में यह बात प्रमाणों के साथ स्पष्ट कर दी है कि “तकफ़ीर” (यानि किसी शख़्स को काफिर घोषित करने) के लिए “इत्माम-ए-हुज्जत” [1] ज़रूरी है और ये सिर्फ़ ख़ुदा ही जानता है और वही बता सकता है कि किसी व्यक्ति या गिरोह पर वास्तव में इत्माम-ए-हुज्जत हो गयी है और अब हम उसको काफ़िर कह सकते हैं। अतः अल्लाह के रसूल (सo) के दुनिया से सिधार जाने के बाद ये हक़ अब किसी व्यक्ति या गिरोह को भी हासिल नहीं रहा कि वो किसी शख़्स को काफ़िर क़रार दे।

यही मामला उन लोगों का है जो इस्लाम को छोड़कर कोई दूसरा मज़हब अपना लें या सिरे से लामज़हब (धर्मविमुख) हो जाएं। उन के बारे में भी इस के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता कि वो ग़ैरमुस्लिम हो गए हैं। इस की वजह ये है कि किसी पैदाइशी मुस्लमान पर इस्लाम की सच्चाई किस हद तक स्पष्ट थी, उस के बारे में पूरे यक़ीन के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। ये चीज़ ख़ुदा ही के जानने की है और वही दिलों के हाल से परिचित है। हम जिस चीज़ को नहीं जानते, उस पर हुक्म लगाने का दुस्साहस भी हमको नहीं करना चाहिए। हमारा काम यही है कि हमें अगर ख़ुदा ने अपने दीन का कुछ ज्ञान दिया है तो हम लोगों को तौहीद (एकेश्वरवाद) और शिर्क (अनेकेश्वरवाद) और इस्लाम एवं कुफ़्र [2] का फ़र्क़ समझाएँ और उन के लिए दीन के तथ्यों की व्याख्या करते रहें। इस से आगे लोगों के कुफ़्र और ईमान और उन के लिए जन्नत और जहन्नुम के फ़ैसले करना हमारा काम नहीं है। ये ख़ुदा का काम है और उसे ख़ुदा ही के पास रहना चाहिए।

इस के बाद उन लोगों का मामला है जो मुसलमान हैं, अपने मुसलमान होने का इक़रार, बल्कि उस पर इसरार (आग्रह) भी करते हैं, मगर कोई ऐसा अक़ीदा (मान्यता) या अमल अपना लेते हैं जो आम तौर पर इस्लाम की शिक्षाओं के विरुद्ध समझा जाता है या किसी आयत या हदीस की कोई ऐसी व्याख्या अपना  लेते हैं जिसे कोई आलिम या उलमा या दूसरे तमाम मुस्लमान बिलकुल ग़लत समझते हैं, उदाहरण के तौर पर इमाम ग़ज़ाली और शाह-वलीउल्लाह जैसे महापुरुषों की ये मान्यता कि तौहीद (एकेश्वरवाद) का सर्वोच्च स्वरूप “वहदत उल-वजूद”[3] (अद्वैत) है या मुहीउद्दीन इब्न अरबी का ये नज़रिया कि “ख़त्म-ए-नबुव्वत”[4] का अर्थ ये नहीं हैं कि नबुव्वत का मक़ाम (पद) और उस के कमालात (सिद्धियाँ) ख़त्म हो गए हैं, बल्कि सिर्फ ये हैं कि अब जो नबी भी होगा, वो मुहम्मद रसूलउल्लाह (सo) की शरीयत का अनुयायी होगा, या अहल-ए-तशीअ (यानि शिया) की ये मान्यता कि मुसलमानों का शासक भी अल्लाह ही का नियुक्त किया हुआ होता है जिसे इमाम कहा जाता है और नबी (सo) के बाद इस पद के लिए सय्यदना अली (रo) की नियुक्ति इसी सिद्धांत के मुताबिक़ ख़ुद अल्लाह तआला की तरफ़ से कर दी गयी थी जिसे क़बूल नहीं किया गया, या अल्लामा इक़बाल जैसे चोटी के विचारक की ये राय कि जन्नत और दोज़ख़ स्थान विशेष नहीं, बल्कि मात्र परिस्थितियां हैं।

ये और इस प्रकार के तमाम विचार एवं मान्यताएँ ग़लत क़रार दिए जा सकते हैं, उन्हें गुनाह और गुमराही भी कहा जा सकता है, लेकिन उन के मानने वाले चूँकि क़ुरआन एवं हदीस ही से प्रमाण ले रहे होते हैं, इस लिए उन्हें ग़ैरमुस्लिम या काफ़िर क़रार नहीं दिया जा सकता। इन नज़रियात-एवं मान्यताओं के बारे में ख़ुदा का फ़ैसला क्या है? इस के लिए क़यामत का इंतिज़ार करना चाहिए। दुनिया में ऐसा मानने वाले अपने इक़रार के मुताबिक़ मुस्लमान हैं, मुस्लमान समझे जाएंगे और उन के साथ सारे व्यवहार उसी तरीक़े से होंगे, जिस तरह मुस्लमानों की जमात (समूह) के एक व्यक्ति के साथ किए जाते हैं। उलमा का हक़ है कि उन की ग़लती उन पर स्पष्ट करें, उन्हें सही बात के क़बूल करने की दावत दें, उन के नज़रियात एवं मान्यताओं में कोई चीज़ शिर्क है तो उसे शिर्क और कुफ़्र है तो उसे कुफ़्र कहें और लोगों को भी उस पर सचेत करें, मगर उन के बारे में ये फ़ैसला कि वो मुस्लमान नहीं रहे या उन्हें मुस्लमानों की जमात से अलग कर देना चाहिए, उस का हक़ किसी को भी हासिल नहीं है। इस लिए कि ये हक़ ख़ुदा ही दे सकता था और क़ुरआन एवं हदीस से परिचित हर शख़्स जानता है कि उस ने ये हक़ किसी को नहीं दिया है।

लेखक: जावेद अहमद गामिदी
अनुवादक: आक़िब ख़ान

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अनुवादक (के द्वारा): 

  1. इतमाम ए हुज्जत : किसी व्यक्ति/क़ौम पर इस्लाम की सच्चाई का इस स्तर पर स्पष्ट हो जाना जिसके बाद उस व्यक्ति/क़ौम के लिए उसे झुठलाने का कोई बहाना बाक़ी न रहे।
  2. कुफ़्र: ऐसी मान्यता जिससे इस्लाम की शिक्षाओं का इंकार हो रहा हो कुफ़्र कहलाता है।
  3. वहदत-उल-वजूद: यानि “ईश्वर”, “आत्मा” और “संसार” अलग-अलग नहीं है बल्कि मूलरूप से एक ही अस्तित्व है।  
  4. ख़त्म-ए-नबुव्वत: यानि इस बात की पुष्टि करना कि हज़रत मुहम्मद(सo) आखरी रसूल(ईश-संदेष्टा) है और आपके सिधार जाने के बाद कोई दूसरा व्यक्ति क़यामत तक नबी या रसूल नहीं हो सकता।    

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