आमतौर पर यह माना जाता है कि कुरआन की कुछ आयात ऐसी हैं जिनका मतलब सिर्फ अल्लाह जानता है और इंसान उनका मतलब नहीं समझ सकते, इन आयात को ‘मुताशाबिहात’ कहा जाता है।

इस बात को स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मुताशाबिहात असल में वह आयात हैं जिनमें उन चीज़ों का उल्लेख (ज़िक्र) हुआ है जो इंसानी समझ से बाहर हैं और इनको तुलनात्मक रूप में उन चीज़ों के ज़रिये बयान किया गया है जिन्हें हम अपनी भाषा में जानते और समझते हैं, मानव बुद्धि उन चीजों की बिलकुल असल शक्ल-सूरत तो नहीं समझ सकती पर इन आयात से कुरआन का क्या मतलब और मकसद है यह आराम से समझा जा सकता है।

मिसाल के तौर पर सूरा हाक्कह में बताया गया है कि क़यामत के दिन अल्लाह का सिंहासन आठ स्वर्गदूत (फ़रिश्ते) उठाये हुए होंगे। अब हम यह तो नहीं जानते कि वह सिंहासन क्या और कैसा है पर हमें बात काफी हद तक समझ आ गयी क्योंकि सिंहासन हमारी भाषा में एक आम शब्द है। इसी तरह, सूरा मुद्दस्सिर में आता है कि नरक के उन्नीस पहरेदार होंगे। अब हम यह तो नहीं बता सकते कि उन्नीस ही क्यों होंगे और वह कैसे होंगे लेकिन उन्नीस से हमें एक निश्चित संख्या बता दी गयी है।

इसी तरह वह आयात जिनमें आदम में रूह फूंके जाने,[1] इसा (स.व) के बिना पिता के जन्म लेने,[2] अल्लाह के मामले जैसे कि सिंहासन पर बैठना,[3] स्वर्ग के सुखों जैसे कि उसके दूध और शहद का स्वरूप[4] और प्रकृति, नरक की यातनाएं जैसे कि आग में पैदा होने वाला ज़क्कूम का पेड़[5] मुताशाबिहात के ही उदाहरण हैं। इन आयात का मकसद लोगों की परीक्षा है क्योंकि इनकी वास्तविकता जाने बिना इनपर विश्वास रखना है।

कुरआन स्पष्ट करता है:
 

هُوَ الَّذِي أَنزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُّحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ  فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ
الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ  وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ  وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِّنْ عِندِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ
[٧:٣] 
   

वही अल्लाह है जिसने तुम्हारे ऊपर किताब उतारी। उसमें कुछ आयतें मुहकम (स्पष्ट) हैं, वह किताब का मूल हैं। और दूसरी आयतें मुतशाबेह (सदृश) हैं। अतः जिनके दिलों में टेढ़ है, वह मुतशाबेह आयतों के पीछे पड़ जाते हैं उपद्रव की तलाश में, और उसकी छुपी हुई वास्तविकता की तलाश में। जबकि इनकी वास्तविकता अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। और जो लोग ठोस ज्ञान वाले हैं, वह कहते हैं कि हम किताब पर ईमान लाये। सब हमारे पालनहार की ओर से हैं। और मार्गदर्शन वही लोग स्वीकार करते हैं जो बुद्धि वाले हैं। (कुरआन 3:7)

उपर दी गयी आयत में यह नहीं कहा गया कि मुताशाबिहात को सिर्फ अल्लाह समझ सकता है पर यह बताया गया है कि इनकी वास्तविकता अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। असल शब्द ‘तावील’ इस्तेमाल हुआ है जो इसी अर्थ में इस आयत में भी आया है:

 قَالَ يَا أَبَتِ هَٰذَا تَأْوِيلُ رُؤْيَايَ 

[١٠٠:١٢] 

और यूसुफ ने कहा: यह है मेरे स्वप्न की वास्तविकता जो मैंने पहले देखा था। (कुरआन 12:100)

जो शब्द युसूफ (स.व) का स्वप्न कुरआन में बयान करते हैं उनका अर्थ हर अरबी जानने वाले को स्पष्ट है हालांकि स्वप्न में देखी गयीं विभिन्न चीजों जैसे कि सूरज, चाँद और ग्यारह सितारों (कुरआन 12:4) से क्या वास्तविकता चिह्नित की गयी थी यह स्वप्न के पूरा हो जाने पर ही पता चली।

इसकी व्याख्या में अमीन अहसन इस्लाही लिखते हैं:

जिस वास्तविकता की तरफ यह मुताशाबिहात इशारा करती हैं वह अपने आप में बहुत साफ और स्पष्ट है। मानव बुद्धि उतना भाग समझ सकती है जितना उसके लिए ज़रूरी है। पर, यह क्योंकि एक अनदेखी दुनिया के बारे में है इसलिए कुरआन इन्हें उपमा (तशबीह) और कहावतों में बयान करता है ताकि कुरआन पढ़ने वाला इसको अपने तौर से समझ सके और मान ले कि इनकी असल शक्ल और आकार सिर्फ अल्लाह ही जानता है। यह (मुताशाबिहात) अल्लाह के गुणों और मामलों को या फिर परलोक के बारे में बयान करती हैं। जितना हमारे लिए ज़रूरी है उतना हम समझ सकते हैं और इससे हमारा ज्ञान और विश्वास बढ़ता है लेकिन इससे आगे बढ़कर इन की असल शक्ल और आकार की तलाश हमें भटका देगी, नतीजा यह होगा कि अपने एक सवाल को हल करने में इंसान और बहुत से सवाल पैदा कर लेगा और उनमें इतना उलझ कर रह जायेगा कि जो जानता था उसके बारे में भी शक में पड़ जायेगा और सिर्फ इसलिए साफ तथ्यों का भी इनकार कर देगा क्योंकि उनकी असल शक्ल और आकार पता नहीं कर सकता।[6]

इस पूरे विवरण से यह साफ़ है कि मुताशाबिहात वह आयात हैं जिनकी वास्तविक शक्ल और आकार मानव बुद्धि नहीं जानती क्योंकि किसी भाषा में उन चीज़ों के विवरण के लिए कोई शब्द नहीं हो सकता जो इंसान ने कभी देखी ही नहीं। नतीजा यह है कि उन शब्दों में इन्हें बयान किया जाता है जो इनसे मिलते-जुलते हैं और जिनको को इंसान जानता और समझता है। यह कहना गलत है कि इन आयात का मतलब साफ़ नहीं है या समझ के बाहर है।

 

– शेहज़ाद सलीम

  अनुवाद: मुहम्मद असजद​​​​


[1]. कुरआन 15:29, 38:72।​
[2]. कुरआन 21:91, 66:12।​
[3]. कुरआन 2:29, 7:54, 20:53।​
[4]. कुरआन 47:15।​
[5]. कुरआन 37:62, 44:43, 56:52। ​
[6]. अमीन अहसन इस्लाही, तदब्बुर-ए-कुरआन, भाग-2, 25-26।