लेखक: शेहज़ाद सलीम
अनुवाद: मुहम्मद असजद

कुरआन ने कुछ खास परिस्थितियों (हालात) में पति को अधिकार दिया है कि वह पत्नी को शारीरिक दंड दे सकता है और यह मामला एक बड़ी बहस का मुद्दा बन चुका है। इस पूरे मामले को इसके सही स्वरूप में समझना ज़रूरी है। कुरआन कहता है:

وَاللَّاتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيرًا
٤: ٣٤ 
और जिन औरतों से तुमको विद्रोह का डर हो उनको [पहले] समझाओ और [उसके बाद] उनको उनके सोने के स्थान पर अकेला छोड़ दो और [उसके बाद भी ना माने तो] उनको दण्ड दो। अतः यदि वह तुम्हारा आज्ञापालन करें तो उन पर कोई कार्यवाही ना करो। निस्सन्देह अल्लाह सबसे ऊपर है, बहुत बड़ा है। (4:34)

इस आयत के संबंध में निम्नलिखित बाते समझना ज़रूरी है:

1. सबसे पहले, यह कदम सिर्फ उस स्थिति में उठाया जा सकता है जब पत्नी पति के परिवार के मुखिया होने के अधिकार से विद्रोह का रवैया अपनाने लगे और परिवार की व्यवस्था खतरे में पड़ जाये। यह असल में परिवार की संस्था (खानदान के इदारे) को टूटने से बचाने के लिए अंतिम उपाय है। पत्नी के विद्रोह के सिवा यह कदम किसी और स्थिति में नहीं उठाया जा सकता। इस विद्रोही रवैये को कुरआन नेنشوز (नुशूज़) कहा है। अवज्ञा या नाफ़रमानी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। आपस का कोई मतभेद अथवा असहमति बातचीत और मशवरे से निपटाएं जायेंगे। सिर्फ पत्नी के विद्रोही आचरण (रवैये) पर यह पूरी प्रक्रिया नियोजित (कार्यवाही) की गयी है।

2. शारीरिक दंड के इस अंतिम उपाय से पहले कुरआन (4:34) ने जो दो चरण और बताएं है वह पूरे हो जाने चाहिए। पति को सबसे पहले पत्नी को समझाने और नसीहत करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। उसको अपने पूरे धैर्य (सब्र) और अपनी पूरी क्षमता से पत्नी को समझाने और उसका रवैया बदलने की कोशिश करनी चाहिए। पूरी कोशिश और एक लम्बे समय तक बार-बार समझाने के बाद भी अगर पत्नी विद्रोही व्यवहार पर अड़ी रहे तब पति को हक है कि दूसरे चरण पर आये और पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध से दूरी बना ले और बिस्तर अलग कर ले। अलगाव की यह प्रक्रिया फटकार और निंदा का ही रूप है और पत्नी के रवैये को बदलने के लिए बड़ी प्रभावशाली अपील है। यह प्रक्रिया भी एक पर्याप्त समय तक चलनी चाहिए ताकि पत्नी को ठीक से बात समझने का मौका दिया जा सके। ज़्यादातर मामलों में इन दोनों प्रक्रियाओं के बाद बड़ा मुश्किल है कि पत्नी का रवैया ना बदले, बल्कि पूरी संभावना (उम्मीद) है कि पति का धैर्य, सहनशीलता और संयम पत्नी के दिल पर विजय प्राप्त कर ले। हालांकि, इन दोनों चरणों में पर्याप्त कोशिश और समय देने के बाद भी अगर पत्नी ना माने तब पति को अधिकार है कि परिवार को टूटने से बचाने के लिए शारीरिक दंड के अंतिम उपाय को अपनाये।

3. अगर पति के पास पत्नी को शारीरिक दंड देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाता तो उसे इस मामले में बहुत सावधान रहना चाहिए कि पत्नी को घाव या चोट ना लग जाये। पति को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह वैसी है अनुशासनात्मक सज़ा है जैसे कि एक माँ अपने विद्रोही बेटे को देती है या जिस तरह एक शिक्षक अपने बिगड़ रहे छात्र को सज़ा देता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि अधिकार का ज़रा सा भी गलत उपयोग किया तो अल्लाह उसका हिसाब लेने वाला है; और इस दुनिया में भी पत्नी को अधिकार है की पति के गलत व्यवहार की शिकायत संबंधित अधिकारियों से कर दे जो उसे उसके व्यवहार की सज़ा दे सकें।

4. अंतिम बात जिस को ध्यान रखना चाहिए वह यह है कि हर अधिकार का प्रयोग हालात को देखते हुए बुद्धि और विवेक के साथ करना चाहिए। यह ज़रूरी नहीं कि हर अधिकार का प्रयोग करना ही करना है, ऐसी भी परिस्थिति हो सकती है जब अधिकार का प्रयोग ना करना ज़्यादा बेहतर हो।