मुसलमानों में आम ख्याल है कि कुरआन की निम्नलिखित आयत ने इस बात से रोक दिया है कि गैर-मुस्लिमों के लिए क्षमा (मग़फिरत) की दुआ की जाये:

مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَن يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَىٰ مِن بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ  ٩: ١١٣   

नबी और उसके मानने वालों के लिए सही नहीं कि वह मुश्रीकून (बहुदेववादियों) के लिए मग़फिरत की दुआ करें। चाहे वह उनके रिश्तेदार ही क्यों ना हों, जबकि उनपर साफ़ हो चुका कि वह नरक में जाने वाले लोग हैं। (9:113)

आयत ही के रेखांकित हिस्से से साफ़ है कि यह रसूलअल्लाह (स.व) के समय के उन बहुदेववादियों (मुशरिकों) के बारे में हैं जो सच को जानते-बुझते हुए भी सिर्फ अपनी ज़िद की वजह से झुठला रहे थे, ऐसे मूर्तिपूजकों को नरक की खबर दी जा रही है और यही वह लोग हैं जिनके लिए क्षमा की दुआ करने से रसूलअल्लाह मुहम्मद (स.व) और बाकी मुसलमानों को मना किया गया है। रसूलअल्लाह (स.व) के बाद अब यह पता नहीं किया जा सकता कि कौन सच का जानते-बुझते इनकार कर रहा है और कौन नहीं क्योंकि यह सिर्फ अल्लाह ही जानता है और अब अल्लाह की तरफ से किसी को “वही” (प्रकाशना) नहीं आती। इसलिए, यह आयत रसूलअल्लाह (स.व) और उनके साथियों (रज़ि.) के समय के बाद के गैर-मुसलमानों के बारे में नहीं है और इसकी बुनियाद पर अब किसी के लिए दुआ करने से रोकना आयत को उसके संदर्भ (पसमंज़र) से बाहर लागू करना है ।

 

– शेहज़ाद सलीम
अनुवाद: मुहम्मद असजद