लेखक – जावेद अहमद ग़ामिदी

अनुवाद और टीका – मुश्फ़िक़ सुलतान

नबी (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के क़ौल (कथन), फेअल (कार्य) और 'तक़रीर-व-तस्वीब'[1] (स्वीकृति एवं पुष्टि) की रिवायतों (उल्लेख परंपरा) को इस्लामी परिभाषा में 'हदीस' कहा जाता है।  यह रिवायतें अधिकतर 'अखबारए-आहाद'[2] के तौर पर हम तक पहुंची हैं। इनके बारे में यह बात तो स्पष्ट है कि उन से दीन में किसी अकीदे या अमल का कोई इज़ाफ़ा नहीं होता। लेकिन इस के साथ ही यह भी सच्चाई है कि नबी (स) की सीरत (जीवनी), आप के 'उस्व-ए-हसनह' (उत्तम आदर्श) और दीन के बारे में आप की व्याख्या के जानने का सब से बड़ा और महत्वपूर्ण माध्यम हदीस ही है। अतः इस की यह अहमियत (महत्व) एसी मानी हूई है, कि दीन का कोई तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी) इस से किसी तरह बे परवाह नहीं हो सकता। हदीस का यही महत्व है जिसके कारण यह आवश्यक है कि कुरआन और सुन्नत के बाद इस का अध्ययन और इस पर चिंतन-मनन के उसूल (सिद्धांत) जाने जाएँ। पहले उन सिद्धांतों को लीजिए जो किसी हदीस के स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए जानने ज़रूरी हैं।

 

1. हदीस की 'सनद'

नबी (स) की निस्बत से जो चीज़ किसी बात को हदीस के दर्जे तक पहुंचाती है, वह उसकी 'सनद'[3] ही है। रावियों (हदीस बयान करने वालों) की अदालत (ईमानदारी), उनकी याददाश्त और सिलसीला-ए-रीवायत का कटा हुआ न होना, यही तीन चीज़ें हैं जो उस जानकारी की रोशनी में ध्यान से परखनी होती हैं जो 'आइमा-ए-रिजाल'[4] ने बड़ी मेहनत से संग्रहित की है। सनद की जांच पड़ताल के लिए यह कसौटी मुहद्दिसीन ने कायम की है और ऐसी विश्वसनीय है कि इस में कोई कमी या बड़ौतरी नहीं की जा सकती। अल्लाह के रसूल (स) के नाम पर किसी संदिग्ध बात का बयान क्योंकि दुनिया और आखिरात दोनों में बड़े गंभीर परिणाम का कारण बन सकता है, इस लिए ज़रूरी है कि यह कसौटी, बिना किसी लचक के, हर रीवायत पर लागू की जाए और केवल वही रिवायतें स्वीकार करने योग्य समझी जाएँ जो इस कसौटी पर हर लिहाज़ से पूरी उतरती हों। इन के इलावा किसी भी रिवायत को नबी (स) की निस्बत से हरगिज़ कोई महत्व न दिया जाए, चाहे वह रीवायत हदीस की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों, बुखारी, मुस्लिम और मुवत्ता इमाम मालिक ही में क्यों न बयान हूई हो।

2. हदीस का 'मतन' (इबारत)

'सनद' की तहकीक के बाद दूसरी चीज़ हदीस का 'मतन' (हदीस के शब्द) है। हदीस रिवायत करने वाले लोगों की जीवनी और चरित्र और उनके हालात से संबन्धित सही जानकारी तक पहुँचने के लिए मुहद्दिसीन ने यद्यपि कोई कसर नहीं छोड़ी और इस काम में अपना पूरा जीवन लगा दिया, लेकिन हर इंसानी काम की तरह हदीस के बयान में भी जो स्वाभाविक खामियाँ इस के बावजूद बाक़ी रह गई हैं[5], उनके कारण यह अनिवार्य है कि हदीस के मतन (शब्दों) को परखने में निम्नलिखित दो बातों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

1. एक यह कि उस में कोई बात कुरआन और सुन्नत के विरुद्ध न हो।
2. दूसरी यह कि इल्म और अक़ल (ज्ञान और विवेक) के प्रामाणिक तथ्यों के विरुद्ध कोई बात न हो।

कुरआन के बारे में हम इस से पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि दीन में उसकी हैसियत 'मीज़ान' (तराजू) और 'फुरकान' (सत्य असत्य में भेद करने की कसौटी) की है। वह हर चीज़ पर रखवाला है। सत्य और असत्य में भेद के लिए उसे 'हकम' (निर्णायक) बना कर उतारा गया है। लिहाजा इस बात को किसी अन्य दलील की आवश्यकता नहीं है कि यदि कोई बात कुरआन के खिलाफ हो तो वह अवश्य ठुकराने योग्य है।

यही मामला सुन्नत का है। दीन की जो हिदायत इस माध्यम से मिली है, उस के बारे में भी यह बात इस से पहले पूरी विश्वसनीयता के साथ स्पष्ट हो चुकी है कि नबी (स) से उसे कुरआन ही की तरह पूरे प्रबंध के साथ आम किया। प्रमाण की दृष्टि से सुन्नत में और कुरआन में कोई फर्क नहीं है। जिस तरह कुरआन उम्मत (मुस्लिम समाज) के इजमा (सहमति) से प्रमाणित है, सुन्नत भी उसी तरह उम्मत के इजमा से प्रमाणित है। सुन्नत के बारे में यह तथ्य क्योंकि बिलकुल क़तई (निश्चित) हैं, इस लिए 'खबर-ए-वाहिद' (हदीस) यदि सुन्नत के विरुद्ध है और दोनों में तौफीक़ (सहमति) पैदा करने की कोई सूरत तलाश नहीं की जा सकती तो उसे किसी भी संकोच के बिना रद्द (ठुकराया) किया जाए गा। 

इल्म और अक़ल (ज्ञान और विवेक) के प्रामाणिक तथ्यों का भी इस विषय में यही स्तर है। कुरआन इस विषय में बिलकुल स्पष्ट है कि उस का संदेश पूरी तरह इनही प्रमाणों पर आधारित है। तौहीद (एक ही ईश्वर की अवधारणा) और मआद (परलोक) जैसी मूल मान्यताओं में भी कुरआन का तर्क इनही पर आधारित है। इनही तथ्यों के परिणाम को वह अपनी शिक्षा से लोगों के सामने उभारता है। कुरआन का हर पाठक इस बात को जानता है कि अपने संदेश की तरफ आकर्षित करने के लिए कुरआन मानव ज्ञान और विवेक के इन तथ्यों को निर्णायक आधार की हैसियत से पेश करता है। उस ने अरब के मुश्रिकीन (अनेक देवताओं की उपासना करने वाले) के सामने भी इनही तथ्यों को निर्णायक आधार के तोर पर पेश किया है और यहूदियों और ईसाइयों के सामने भी। इन तथ्यों के विरोधियों को वह अपनी मन मानी इच्छाओं का अनुसरण करने वाले लोग घोषित करता है। अन्तर्ज्ञान के तथ्य, इतिहास के तथ्य, शोध और अनुसंधान के परिणाम, यह सब कुरआन में इसी हैसियत से  प्रयुक्त हुए हैं। इस लिए वह बातें जिन्हें स्वयं कुरआन ने सत्य-असत्य में भेद करने के लिए आधार माना है, उन के विरुद्ध कोई 'खबर-ए-वाहिद' (हदीस) कैसे स्वीकार्य हो सकती है? यह स्पष्ट है कि हम उसे हर हाल में त्याग दें गे। सर्वश्रेष्ठ मुहद्दिसीन का भी इस विषय में यही पक्ष है। 'अल्-किफ़ायह फी इल्म अल्-रिवायह' (الكفايه في علم الرواية) इस विषय की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है। उस के रचयता खतीब बगदादी लिखते हैं: 

ولا يقبل خبر الواحد في منافاة حكم العقل وحكم القرآن الثابت المحكم والسنة المعلومة والفعل الجاري مجرى السنة كل دليل مقطوع به

"'खबर-ए-वाहिद' अर्थात हदीस अस्वीकार्य होगी यदि वह बुद्दि और विवेक के विरुद्ध हो, या कुरआन के किसी स्पष्ट आदेश के विरुद्ध हो, किसी जानी हुई सुन्नत या किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध हो जो सुन्नत के बराबर हो, किसी 'दलील-ए-कतई' (निर्णायक प्रमाण) से उस का विरोध स्पष्ट हो।" [' अल्-किफ़ायह फी इल्म अल्-वायह', अरबी संस्करण, प्रष्ठ 432]

इस के बाद अब फ़हम-ए-हदीस (हदीस समझने) के सिद्धांतों को देखते हैं:

अरबियत का ज़ौक़ अर्थात अरबी भाषा शैली की समझ

पहली चीज़ यह है कि पवित्र कुरआन की तरह हदीस की भाषा भी 'अरबी-ए-मुअल्ला'[6] है। इस में कोई संदेह नहीं कि हदीस की रिवायत (बयान) अधिकतर بالمعنى  'बिल्-माना'[7] हुई है, लेकिन नबी (स) और उनके साथियों की भाषा इस के बावजूद इतनी सुरक्षित ज़रूर रही है कि एक भाषा विशेषज्ञ काफी हद तक दूसरी चीजों से अलग पहचान सकता है। कुरआन की तरह इस भाषा का भी एक विशेष स्तर है जो अपने से कम स्तर की भाषा की मिलावट अपने साथ गवारा नहीं करता। इस लिए यह ज़रूरी है कि हदीस के विद्यार्थी बार बार के अध्ययन से इस भाषा की ऐसी कुशलता अपने अंदर पैदा कर लें कि न الشيخ و الشيخة  जैसी चीजों को केवल भाषा ही के आधार पर ठुकरा देने में उन्हें कोई संकोच हो और न البكر بالبكر  जैसी कठिन शैली को समझने में उन्हें कोई परेशानी हो। शब्द-साधन और व्याकरण की कठिनाइयों को सुलझाने के लिए भी यह कुशलता अनिवार्य है। इस ज्ञान के विशेषज्ञों ने जो कुछ इस विषय में लिखा है, उस पर आदमी की नज़र आलिमाना होनी चाहिए। अरबी भाषा की सूक्ष्मता और शैली से अपरिचित व्यक्ति हदीस की कठिनाइयों को हल नहीं कर सकता।

कुरआन की रौशनी

दूसरी चीज़ यह है कि हदीस को कुरआन की रौशनी में समझा जाए। दीन में कुरआन का मक़ाम (स्तर) हम इस से पूर्व लिख चुके हैं। नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने अपने नबी और रसूल होने की हैसियत से जो कुछ किया, उस के इतिहास का निश्चित और प्रामाणिक उल्लेख भी कुरआन ही है। लिहाजा हदीस के अधिकतर विषयों का संबंध कुरआन से वही है जो किसी शाखा का अपनी जड़ से और व्याख्या का अपने मूल ग्रंथ से होता है। मूल ग्रंथ को देखे बिना उसकी व्याख्या को समझना असंभव होता है। हदीस को समझने में जो गलतियाँ अब तक हुई हैं, उस का यदि गहरा विश्लेषण किया जाए, तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। नबी (स) के समय में 'रज्म' (पथराव के माध्यम से मृत्यु दंड) की घटनाएँ, कअब बिन अश्रफ का कत्ल, अज़ाब-ए-क़ब्र और शिफाअत (मध्यस्थता) की अहादीस और कुछ जाहिरा तौर पर विवादास्पद वचन امرت ان اقاتل الناس  (अर्थात मुझे आदेश दिया गया है कि लोगों से युद्ध करूँ)[8] या من بدل دینہ فاقتلوہ  (अर्थात, जो अपना दीन बदल दे उसे कत्ल करो)[9] जैसे निर्देश इसी कारण उलझन पैदा करते हैं कि उन्हें कुरआन की रौशनी में समझने की कोशिश नहीं कि गई। हदीस को समझने मे यदि इस सिद्धान्त को ध्यान में रखा जाए तो उस की अधिकतर उलझनें हल हो जाती हैं।

मौका-व-महल (समय और अवसर)

तीसरी चीज़ यह है कि हदीस में जिस विषय से संबन्धित बात बयान हुई है, उस के समय और अवसर को समझ कर उस का अर्थ निर्धारित किया जाए। बात किस समय की गई, किस संदर्भ में की गई और किन लोगों से की गई, यह सब चीज़ें यदि ध्यान में न रखी जाएँ, तो अत्यंत स्पष्ट बातें भी कभी पहेली बन जाती हैं। हदीस समझने में इस सिद्धान्त का असाधारन महत्व है।  الائمۃ من قریش  (अर्थात, तुम्हारे शासक कुरेश में से ही होंगे)[10] एक मशहूर हदीस है। इस हदीस के शब्दों से हमारे उलमा को यह गलत फहमी हुई कि मुसलमानों के इमाम (अर्थात, हुक्मरान/शासक) केवल कुरेश के खानदान में से होंगे। यदि यह बात मान ली जाए तो इस्लाम और ब्राह्मणवाद में कम से कम राजनीतिक दृष्टि से कोई फर्क नहीं रह जाता। उस गलत अर्थ का कारण केवल यह था कि एक बात जो नबी (स) की मृत्यु के बाद की राजनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में उस समय के लिए कही गई थी, उसे दीन का एक स्थायी आदेश समझ लिया गया। हदीस के पूरे संग्रह में इस तरह की बातें बहुत हैं और उनके विषय में महत्वपूर्ण हैं। उनका वास्तविक अर्थ समझने के लिए इस सिद्धान्त को ध्यान में रखना अनिवार्य है।

एक विषय की सभी अहादीस पर नज़र

चौथी चीज़ यह है कि किसी हदीस का अर्थ निर्धारित करते समय उस विषय से संबन्धित सभी हदीसें मद्देनज़र रखी जाएँ। कई बार ऐसा होता है कि आदमी किसी हदीस का एक अर्थ समझता है लेकिन उसी विषय की बाकी हदीसों का अध्ययन करने से बिलकुल दूसरा अर्थ सामने आता है। इस की एक मिसाल तस्वीर के विषय की हदीसें हैं। उन में यदि कुछ हदीसों को देखें तो लगता है की हर क़िस्म की तस्वीर को प्रतिबंधित कहा गया है। लेकिन इस विषय की सभी हदीसें देखिए तो बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है की केवल उन तसवीरों को अवैध कहा गया है जो लोगों की पूजा और उपासना के लिए बनाई गई हों। हदीस के संग्रह से इस तरह के कई उदाहरण पेश किए जा सकते हैं। इस लिए ज़रूरी यह है कि किसी एक हदीस के अर्थ के बारे में यदि शंका हो तो उस विषय से संबन्धित सभी अहादीस को देखे बिना कोई अंतिम राय कायम न की जाए।

अक़ल-व-नक़ल (बुद्धि और ईशवाणी)

पाँचवी चीज़ यह है कि हदीस के समझने में यह ध्यान रखा जाए कि बुद्धि और वाणी/पैगंबर की बात में कोई विरोध नहीं हो सकता। ऊपर हदीस के ग्रहण एवं खंडन के उसूल बताते हुए हम स्पष्ट कर चुके हैं कि दीन आधारित ही इल्म और अक़ल (ज्ञान और विवेक) के प्रामाणिक तथ्यों पर है। इस लिए कोई चीज़ यदि इन तथ्यों से भिन्न नज़र आती है तो उस पर बार बार विचार करना चाहिए। यह कोई सही ज्ञानी तरीका नहीं है कि इस तरह के अवसर पर आदमी तुरंत हदीस को रद्द कर दे या ज्ञान और विवेक की आँखें बंद करके उस के कोई गलत अर्थ स्वीकार कारले। अनुभव बताता है कि एक हदीस को जब सही दृष्टि से देखा गया तो कभी कोई विरोध बाकी नहीं रहा और बात बिलकुल स्पष्ट हो गई। यह चीज़ उसी समय प्राप्त होती है जब पूरे विश्वास के साथ माना जाए की बुद्धि और ईश्वरीय वचन में कोई विरोध नहीं हो सकता। हमारे प्राचीन और नवीन विद्वानों में से जिन लोगों ने इस सिद्धान्त को ध्यान में रखा है, उनकी पुस्तकों में इस के अच्छे परिणाम जगह जगह देखे जा सकते हैं। हदीस की समझ में इस चीज़ को किसी हाल में नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए।

اللّٰھم ارنا الحق حقًا وارزقنا اتباعہ، وارنا الباطل باطلاً وارزقنا اجتنابہ

'ए अल्लाह, हमें सत्य वैसे दिखा जैसे कि वह है, और उसी पर हमें चला और हमें असत्य वैसे ही दिखा जैसे कि वह है, और उस से हमें बचाए रख।

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टिप्पणियां

[1] 'तक़रीर-व-तस्वीब': इस का अर्थ यह होता है कि नबी (सल्ल॰) के सामने किसी मुसलमान ने कोई कार्य किया और उनहों ने उसको देखा लेकिन उसको नकारा नहीं या उस कार्य की निंदा नहीं की। इस प्रकार उस कार्य को उनकी मौन स्वीकृति प्राप्त हो गई।

[2] 'अखबार-ए-आहाद': मुहद्दिसीन (हदीस विशेषज्ञ) हदीस के लिए एक और शब्द ‘खबर’ का प्रयोग करते हैं। 'खबर' का बहुवचन 'अखबार' होता है। मुहद्दिसीन के नज़दीक हदीस या खबर की दो बड़ी किस्में हैं:

  1. खबर-ए-मुतवातिर
  2. खबर-ए-वाहिद या अखबार-ए-आहाद

खबर-ए-मुतावातिर : वह खबर जिस का बयान (वर्णन) इतने अधिक व्यक्ति करें कि यह असंभव प्रतीत हो कि इतने अधिक व्यक्ति, एक साथ, बिना किसी मजबूरी के, एक झूठी बात पर सहमत होंगे|

खबर-ए-वाहिद : उसको कहते जिस में 'खबर-ए-मुतावातिर' के गुण नहीं हों और उसकी रिवायत बहुत कम लोगों ने की हो. अर्थात रिवायत करने वालों की उतनी संख्या न हो कि विश्वास से यह कहा जा सके कि इस में किसी शक की गुंजाइश मौजूद नहीं है। हदीस का असल ज़ख़ीरा (संग्रह) इनही 'अखबार-ए-आहाद' पर आधारित है।

[3] नबी (स) से हदीस सुनने और आगे बयान करने वाले लोगों की कड़ी को हदीस के परिभाषा में 'सनद' कहा जाता है।

[4] 'आइमा-ए-रिजाल' : यह हदीस ज्ञान के वह विशेषज्ञ हैं जिनहोने हदीस बयान करने वालों के जीवन का अध्ययन किया और उनकी नीजी ज़िंदगी का पूरा हाल संग्रहितकिया जिस से यह पता लगे कि यह व्यक्ति कितना सच्चा या झूटा, कितना बुद्धिमान या भुलक्कड़ था और किस जमाने में रेहता था आदि। इन बातों से यह पता लगता है कि इसके द्वारा बयान की गई हदीस पर विश्वास किया जा सकता है या नहीं। यह बात याद रखनी चाहिए कि सहाबा अर्थात नबी (स) के साथी सहयोगी, ईमानदारी और बेईमानी, सच्चे या झूटे होने की जांच पड़ताल से मुक्त हैं, क्यों कि उनकी सच्चाई और ईमानदारी की पुष्टि स्वयं अल्लाह तआला ने पवित्र कुरआन में की है, देखिए सूरह 3: आयत 110, सूरह 48: आयत 18, सूरह 9: आयत 100 आदि।

[5] इस के विस्तार के लिए देखिए, इस विषय पर उस्ताज़ इमाम अमीन अहसन इस्लाही की पुस्तक 'मबादी-ए-तदब्बुर-ए-हदीस'

[6] 'अरबी-ए-मुअल्ला': लेखक का 'अरबी-ए-मुअल्ला' सए वह अरबी भाषा तात्पर्य है जिस में कुरआन नाज़िल हुआ और जो हज़रत मुहम्मद (स) के समय शहर मक्का की भाषा थी। 

[7] रिवायत बिल्-माना का अर्थ होता है कि नबी (स) के शब्द हूबहू संचारित न हुए हों बल्कि उनके अर्थ को नबी (स) से सुनने वाले व्यक्ति ने अपने शब्दों मे बयान किया हो।

[8] बुखारी हदीस 25

[9] बुखारी हदीस 3017

[10] मुस्नद अहमद हदीस 11898