कुछ विद्वानों का मानना है कि कुरआन की व्याख्या (तशरीह-तफसीर) हदीसों पर निर्भर है और कुरआन को हर हाल में सिर्फ हदीसों के ज़रिये ही समझा जाना चाहिए। हालांकि, कुरआन खुद मिज़ान और फुरक़ान की हैसियत रखता है और कुरआन का यह स्थान ज़ोर देता है कि बाकी हर चीज़ की व्याख्या कुरआन की रौशनी और उसके मार्गदर्शन में होनी चाहिए।

ग़ामिदी साहब लिखते हैं:[1]

कुरआन अपने बारे में बयान  करता है:

اللَّهُ الَّذِي أَنزَلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ وَالْمِيزَانَ 

[٤٢: ١٧]

अल्लाह ही है जिसने सत्य के साथ यह किताब उतारी है और अपनी मिज़ान नाज़िल कर दी है। (42:17)

इस आयत का अर्थ है कि अल्लाह ने कुरआन उतारा है जो कि अच्छाई को बुराई से अलग कर देने वाला इंसाफ का पैमाना है। इसी पैमाने पर सब चीज़ों को परखा जायेगा और किसी और चीज़ को यह हैसियत हासिल नहीं है जो इसके लिए पैमाना बन सके।

 

تَبَارَكَ الَّذِي نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلَىٰ عَبْدِهِ لِيَكُونَ لِلْعَالَمِينَ نَذِيرًا 

[٢٥: ١]

बड़ी ही बरकत वाली है वह हस्ती जिसने अपने बन्दे पर यह फुरक़ान उतारा है, इसलिए कि वह सारे जहॉन के लिए खबरदार करने वाला हो। (25:1)

 

कुरआन उसी अर्थ में फुरक़ान है, यानी यह वह किताब है जो अंतिम और पूर्ण रूप (पूरी तरह) से सत्य को असत्य से अलग कर देती है, फुरक़ान शब्द से यह अर्थ निकलता है कि यह किताब वह कसौटी, वह मानक है जिस पर हर चीज़ को परखा जाना चाहिए और दीन के मामलों में इस का फैसला निर्णायक और आखिरी है।

सभी को राय में मतभेदों का हल तलाश करने के लिए कुरआन ही की तरफ आना चाहिए। धर्म संबंधित मामलों में इसी का स्थान सर्वोच्च (सबसे ऊपर) होना चाहिए और हर व्यक्ति बाध्य है (उस पर लाज़िम है) कि इसको किसी और चीज़ के आधीन या किसी पर निर्भर ना समझे।

कुरआन एक पैगंबर और रसूल की हैसियत में मुहम्मद (स.व) की ज़िन्दगी का सबसे निश्चित और प्रामाणिक (मुस्तनद) अभिलेख (रिकॉर्ड) है। इसीलिए, हदीस में आने वाले ज्यादातर विषय (मोज़ू) कुरआन से वैसा ही संबंध रखते हैं जैसा कि एक शाखा और पेड़ का या जैसा कि विस्तार और वह मूलपाठ जिसका वह विस्तार है। मूलपाठ के बिना उसके विस्तार, स्पष्टीकरण और व्याख्या को ना समझा जा सकता है और ना उसका कोई मोल रह जाता है। हदीसों को समझने और उनकी व्याख्या में की गयी गलतियों का अगर बारीकी से विश्लेषण (छान-बीन) किया जाए तो यह मामला बिलकुल साफ़ हो जाता है। रसूलअल्लाह (स.व) के जीवन में रज्म[2], का’ब इब्न अशरफ का कत्ल, कब्र का अज़ाब, मूर्तद को मौत की सज़ा[3] यह सब वह मुद्दे बन गए है जिनसे बहुत भ्रम फैला है और जिनके गलत अर्थ निकाल लिए गए हैं, और यह इसीलिए हुआ कि इन्हें कुरआन में दिए गए इनके आधार के बिना समझा गया है।
 

– शेहज़ाद सलीम
  अनुवाद: मुहम्मद असजद​​​​


[1]. ग़ामिदी, मीज़ान 24, 64।​​
[2]. पत्थर बरसा कर मौत की सज़ा।​
[3]. सही बुखारी सं.3, भाग-3 1098, (न. 2854)।