लेखक: शेहज़ाद सलीम
अनुवाद: मुहम्मद असजद

निम्नलिखित हदीस की बुनियाद पर, आमतौर पर यह समझा जाता है कि अगर पत्नी पति से हमबिस्तर होने के लिए मना कर दे तो फ़रिश्ते उसे धिक्कारते हैं।

अबू हुरैरा (रज़ि.) से रवायत हैं कि रसूलअल्लाह (स.व) ने फरमाया: “जब पति अपनी पत्नी को हमबिस्तरी के लिए कहे और वह मना कर दे और [नतीजातन] पति सारी रात नाराज़गी में गुज़ारे, तो फ़रिश्ते पूरी रात पत्नी पर लानत करते  हैं।”[1]

इस हदीस को समझने के लिए निम्नलिखित बातें समझ लेनी ज़रूरी हैं:

सबसे पहले, पति और पत्नी एक दूसरे की यौन इच्छाओं (जिन्सी ज़रूरतों) के लिए जायज़ ज़रिया हैं और इस तरफ से वह एक दूसरे की पवित्रता (पाकीज़गी) और सतीत्व की रक्षा (हिफाज़त) करते हैं। पवित्रता की रक्षा एक परिवार को बनाये रखने के लिए ज़रूरी है। पारिवारिक व्यवस्था (खानदान के इदारे) के ऊपर ही समाज की स्थिरता और मज़बूती टिकी हुई है। इसीलिए कोई भी चीज़ अगर इस पवित्रता और पारिवारिक व्यवस्था के लिए खतरा बनती है तो अल्लाह उसे पसंद नहीं करता।

दूसरे, इस हदीस में दिया गया हुक्म सिर्फ पत्नी नहीं बल्कि पति पर भी बराबर लागू होता है। कुरआन (2:226-7) में दिए गए ईला  के निर्देश से यह साफ़ हो जाता है। इस्लाम के आने से पहले अरब में लोग नारज़गी में अपनी पत्नियों से यौन-संबंध ना बनाने की कसम ले लिया करते थे। अल्लाह ने इसमें पति के लिए चार महीने का समय तय कर दिया कि इन में वह पत्नी के बारे में फैसला कर लें यानी या तो संबंध फिर शुरू करें या फिर पत्नी को तलाक दें, लेकिन इससे यह भी साफ़ हो जाता है कि आम हालात में पति को भी बिना किसी जायज़ वजह के पत्नी से यौन-संबंध तोड़ने की अनुमति (इजाज़त) नहीं है, वह भी इस हद तक कि अगर वह इस तरह की कसम भी खा ले तो उसको भी तोड़ा जायेगा। यह पत्नी का हक़ है और अगर पति उसे पूरा ना करे तो वह कानून की नज़र में भी मुजरिम होगा और परलोक (आखिरत) में अल्लाह के सामने भी मुजरिम होगा।

तीसरे, पत्नी या पति के संबंध से इनकार करने के कारण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, यदि कारण थकान, बीमारी अथवा मनोदशा (ज़ेहनी हालात) है तो फिर यह कोई जुर्म नहीं है। रवैये पर सवाल तब उठता है जब पति या पत्नी जान-बूझ कर दूसरे की प्राकृतिक (फितरी) जरूरतों से बचने लगे।

 


[1]. सही बुखारी, भाग.2, 1257, (न. 3237)