मुसलमानों में आम तौर पर माना जाता है कि जब दुनिया का अंत करीब होगा तो ईसा (स.व) जिनको दुनिया से ज़िन्दा उठा लिया गया था, वापस आयेंगे और उनका यह दूसरी बार आना असल में कयामत का एक संकेत होगा।

इस मुद्दे का विश्लेषण (तजज़िया) करते हुए गामदी साहब लिखते हैं: [1]

जहाँ तक उन हदीसों का सवाल है जिनमें ईसा (स.व) के आने की सूचना है तो, हालांकि, मुहद्दीसीन (हदीस के विद्वानों) ने आम तौर पर उन्हें स्वीकार किया है लेकिन कुरआन की रौशनी में उन्हें देखा जाये तो उनमें संदेह (शक) उभर आते हैं।
पहले, ईसा (स.व) के व्यक्तित्व (शख्सियत) पर कुरआन ने विभिन्न पहलुओं से चर्चा की है। कुरआन ने उनकी दावत और उनके व्यक्तित्व के बारे में काफी जगह ज़िक्र किया है। कयामत और परलोक का विषय (मोज़ू) भी कुरआन ने बार-बार उठाया है। अल्लाह के एक महान पैगंबर का आसमान से वापस उतर आना कोई मामूली घटना नहीं है। इसका ज़िक्र कुरआन में होना चाहिए था, और बावजूद इसके कि कुरआन में ऐसी कई जगह हैं जहां यह बात बयान की जा सकती थी हम यह देखते है कि कुरआन ने ऐसी किसी घटना की कोई जानकारी नहीं दी है। किसी एक जगह भी कुरआन ने ऐसा कुछ बयान नहीं किया है। क्या इल्म और अक्ल इस चुप्पी से संतुष्ट (मुतमईन) हो सकते हैं ? यह बात स्वीकार करना बड़ा मुश्किल है।

दूसरे, कुरआन में अल्लाह और ईसा (स.व) के बीच कयामत के दिन का एक संवाद (बातचीत) दर्ज है। इस संवाद के दौरान अल्लाह उनसे उस मामले में सवाल करेगा जिसमें ईसाइयों ने असल में गुमराही का दामन थामा: ईसा (स.व) और उनकी माँ को उपास्य (माबूद) मान लेना। ईसा (स.व) से पूछा जायेगा कि क्या उन्होंने लोगों से कहा था की अल्लाह को छोड़ कर उन्हें और उनकी माँ (मरियम) को उपास्य बना लो ? इस सवाल के जवाब में ईसा (स.व) कहेंगे कि उन्होंने अपने लोगों से वही बात कही जो अल्लाह ने उन्हें निर्देश (हुक्म) किया, और जब तक वह उनके बीच रहे वह उन पर गवाह रहे और अपनी मृत्यु के बाद वह नहीं जानते कि लोगों ने क्या अच्छा–बुरा किया, और उनकी मृत्यु के बाद अल्लाह ही लोगों पर गवाह था। इस संवाद में यह साफ महसूस होता है कि अगर ईसा (स.व) दुनिया में वापस आये थे तो फिर आखिरी वाक्य (जुमला) बड़ा अनुचित (नामुनासिब) है। अगर वह कयामत से पहले दुनिया में वापिस आये थे तो फिर उन्हें कहना यह चाहिये था कि वह जानते हैं की लोगों ने क्या मामला किया और दुनिया के अंत से कुछ वक़्त पहले भी वह लोगों को उनकी गुमराही के बारे में ख़बरदार करने गए थे। कुरआन में आता है:

مَا قُلْتُ لَهُمْ إِلَّا مَا أَمَرْتَنِي بِهِ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ ۚ وَكُنتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَّا دُمْتُ فِيهِمْ ۖ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنتَ أَنتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنتَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
[٥: ١١٧ ]

मैंने तो उनसे वही बात कही थी जिसका आपने मुझे आदेश दिया था कि अल्लाह की बंदगी करो जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी। मैं उन पर निगरान रहाजब तक मैं उनके बीच था। फिर जब आपने मुझे मृत्यु दी तो फिर उसके बाद आप ही उनके निगरान रहे हैं और आप सब बातों पर गवाह हैं। (5:117)

तीसरे, अल्लाह ने कुरआन की एक आयत में यह बताया है कि कयामत के दिन तक ईसा (स.व) और उनके मानने वालों के साथ क्या मामला होगा। इल्म और अक्ल इसकी मांग करते हैं की यहां कयामत से पहले ईसा (स.व) के दुबारा दुनिया में आने के बारे में भी बताया जाना चाहिए था, हालांकि ऐसी कोई खबर नहीं दी गई। अगर ईसा (स.व) को वापिस आना है तो फिर यहां क्यों इसके बारे में ख़ामोशी है ? इसकी कोई भी वजह समझ नहीं आती। आयत इस प्रकार है:

إِنِّي مُتَوَفِّيكَ[2] وَرَافِعُكَ إِلَيَّ وَمُطَهِّرُكَ مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَجَاعِلُ الَّذِينَ اتَّبَعُوكَ فَوْقَ الَّذِينَ كَفَرُوا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ ۖ ثُمَّ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأَحْكُمُ بَيْنَكُمْ فِيمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
[٣: ٥٥]

“ऐ ईसा, मैंने फैसला किया है कि तुझे मृत्यु दूँगा और अपनी ओर उठा लूँगा और (तेरे) इन मुनकिरों (इनकार करने वालों) से तुझे पवित्र (पाक) करूँगा और तेरा अनुसरण (पैरवी) करने वालों को न्याय के दिन तक इन मुनकिरों पर श्रेष्ठता (ग़लबा) दूँगा। फिर तुम सब को अंततः मेरे पास आना है। तब उस समय मैं तुम्हारे बीच उन चीज़ों का फैसला करूँगा जिनमें तुम मतभेद (इख्तेलाफ़) करते रहे हो।” (3:55)


– शेहज़ाद सलीम
  अनुवाद: मुहम्मद असजद​​​

 


[1]. ग़ामिदी, मीज़ान, 178-179।
[2]. आयत में शब्द “मुतावफ्फीका” का अनुवाद मृत्यु किया गया है, यही इसके आम मायने (अर्थ) हैं। शब्द “तुवफ्फी” पूरा हो जाने के मायने में इस्तेमाल होता है लेकिन जब यह किसी इंसान के लिए इस्तेमाल किया जाता है तब इसके मायने मृत्यु के लिए जाते हैं। जिन अनुवादों में इस शब्द को किसी और अर्थ में लिया गया है वहां असल में ईसा (स.व) के वापिस आने की धारणा को  पहले से ध्यान रखकर इसका अनुवाद किया गया है। अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के (ताअसुब से ज़ेहन को साफ करके) इस आयत को देखा जाये तो इस शब्द का अनुवाद अरबी  भाषा अनुसार मृत्यु ही किया जायेगा।