कुछ लोग सूद (ब्याज) लेने को सही साबित करने के लिए कहते हैं कि जिस तरह किसी वस्तु को इस्तेमाल के लिए लेने वाले से किराया लिया जाता है उसी तरह सूद भी उधार दिए गए पैसों के किराए समान ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह तर्क देते हैं कि जिस तरह एक व्यक्ति घर का प्रयोग करने पर किराया देता है उसी तरह वह उधार दिए गए पैसों का किराया देता है जिसको सूद कहा जाता है। इसलिए जब किराया लेने की अनुमति (इजाज़त) है तब उसी तरह सूद लेने की भी अनुमति होनी चाहिए।

इस तर्क के विश्लेषण (analysis) से पता चलता है कि जो समानता निकाली जा रही है वह सही नहीं है। किराया असल में सिर्फ उन चीज़ों के लिए लिया जा सकता है जो इस्तेमाल करने के बाद वापिस की जा सकती है (non-consumables), उन चीज़ों लिए नहीं जो इस्तेमाल करने में खत्म हो जाती हैं (consumables)। वह चीज़ें जो अपनी जगह बरकरार रहती हैं और ज़रूरत के बाद  असल मालिक को वापस देनी होती तो उनको फिर से बनाना या उत्पन्न नहीं करना पड़ता, सिर्फ इनके मालिक को वापस सौंप देना होता है। इसी प्रकार, जब एक घर किराए पर लिया जाता है तो वह इस्तेमाल होते हुए अपनी जगह बरकरार रहता है। इसके उलट पैसा जब उधार लिया जाता है तो वह इस्तेमाल हो जाता है और बरकरार नहीं रहता, वह उस ज़रूरत पर खर्च हो जाता है जिसके लिए वह लिया गया था। उधार लिए गए पैसे को वापस चुकाने के लिए उसे फिर से उत्पन्न करना या कमाना पड़ता है और साथ ही उसके ऊपर उससे कुछ अधिक भी पैदा करना पड़ता है सूद चुकाने के लिए। यह उधार लेने वाले व्यक्ति पर दोहरा दंड हो जाता है कि वह पहले तो वापिस करने के लिए मूल (principal) को दुबारा पैदा करे और फिर उसके ऊपर सूद भी कमाकर दे।
तकनीकी तौर पर यह कहा जा सकता है कि सूद चल पूंजी (circulating capital) पर लिया जाता है और किराया अचल पूंजी (fixed capital) पर।

 लेखक: शेहज़ाद सलीम
 अनुवाद: मुहम्मद असजद