एक धारणा यह भी है कि कुरआन में पाठभेद (Variant Readings) हैं। यानी कुरआन की एक ही आयत के अलग-अलग संस्करण मौजूद हैं। यह भिन्नता सिर्फ उच्चारण (तलफ्फुज़) में ही नहीं बल्कि शब्दों में भी हो सकती है, उदाहरण के तौर पर कहीं कोई शब्द घट-बढ़ जाना, एकवचन या बहुवचन[1] का फर्क हो जाना या फिर क्रिया संरचना[2] में बदलाव होना।[3]

मानने वाले यह भी मानते हैं कि यह पाठभेद अल्लाह ही की तरफ से हैं। पहली बार इन पाठभेदों को अबू उबैद कासिम इब्न सल्लाम (मृ. 224 हि.) ने किताब के रूप में जमा किया, उबैद कासिम ने पच्चीस, अबू जाफर अल् तबारी (मृ. 310 हि.) ने बीस से अधिक पाठभेद जमा किए, बाद में अबू बक्र इब्न मुजाहिद (मृ. 324 हि.) ने सात प्रसिद्ध पाठभेद चुने। यह सात अपने पाठ करने वालो से प्रसिद्ध हो गए और इस प्रकार हैं:

      स्थान – पाठक

1. मदीना – नाफी (मृ. 169 हि.)

2. मक्का – इब्न कसीर (मृ. 120 हि.)

3. दमिश्क – इब्न अमीर (मृ. 118 हि.)

4. बसराह – अबू अम्र (मृ. 154 हि.)

5. कुफा – आसिम (मृ. 127 हि.)

6. कुफा – हमज़ाह (मृ. 156 हि.)

7. कुफा – किसाई (मृ.189 हि.)

निम्नलिखित कारणों से इनमें से किसी को भी कुरआन के बराबर नहीं माना जा सकता है:

1. इस्लाम के विद्वान (आलिम) इस बात पर एकमत (इज्मा) हैं कि कुरआन मुतावातिर है [यानी लोगों की इतनी बड़ी संख्या ने कुरआन कंठस्थ (ज़बानी याद) कर अगली पीढ़ियों तक प्रेषित किया (पहुँचाया) है कि गलती होना मुमकिन नहीं है] ।

अगर इन पाठभेदों की सनद देखें तो पता चलता है कि इनमें से कोई एक भी मुतावातिर नहीं हैं, यह अपने प्रसिद्ध होने के बिंदु से अब तक तो मुतावातिर हो सकते हैं लेकिन सीधे रसूलअल्लाह (स.व) से लेकर नहीं, ज़्यादा से ज़्यादा इन्हें अखबारे आहाद[4] की श्रेणी में रखा जा सकता है।

अल् ज़र्कशी लिखते है:
ज़्यादातर लोगों की राय है कि यह सात किर’आत (पाठभेद) मुतावातिर हैं, लेकिन एक राय यह भी है कि यह मशहूर[5] हैं। हकीक़त यह है कि यह अपने सातों कुर्रा (पाठकों) से तो मुतावातिर हैं लेकिन रसूलअल्लाह (स.व) से इनका तवातुर पूरी तरह से साबित नहीं है, इन सातों की सनद में जिन लोगों का नाम किर’आत की किताबों में आता है उनमें खबर किसी बड़ी संख्या में नहीं बल्कि एक ही व्यक्ति से दूसरे तक आगे बढ़ी है और इसको हम तवातुर नहीं कह सकते।[6]

2. यह पाठभेद ना सिर्फ अखबारे आहाद हैं, बल्कि इनकी सनद में जिन लोगों का नाम आता है उनमें से बहुत को इल्म अल-रिजाल[7] के विद्वानों ने इस योग्य ही नहीं माना है कि उनसे कोई हदीस[8] स्वीकार की जाये, उदाहरण के लिए हफ्स इब्न सुलेमान जो कि प्रमुख कुर्रा के सभी शिष्यों में से शायद सबसे प्रसिद्ध और सबसे ज़्यादा प्रशंसित माने जाते हैं, उनके बारे में लिखा है:

अब्द अल्-रहमान इब्न अबी-हातिम, अब्द अल-रहमान इब्न युसूफ इब्न खिराश और इमाम मुस्लिम की राय में हफ्स इब्न सुलेमान मतरूक अल् हदीस हैं (इनसे हदीस नहीं स्वीकार की जा सकती)। ‘अली इब्न अल्-मदीनी और अबू ज़ुरआह के मुताबिक वह हदीस के मामले में कमज़ोर (ज़ईफ) हैं, याह्या इब्न माइन की राय में अबू कुज़ामाह सरखसी और उस्मान इब्न सईद अल् ज़रिमी के मुताबिक उनकी खबर भरोसे के काबिल नहीं, अल्-नासाई का भी यही ख्याल है। सालेह इब्न मुहम्मद अल् बग़दादी कहते है कि इब्न सुलेमान की बयान की गई कोई खबर प्रमुख प्रमाण के तौर लिखने लायक नहीं और वह सब धर्म से अपरिचित बातें बयान करती हैं, अब्द अल्-रहमान इब्न युसूफ इब्न खिराश कहते हैं कि इब्न सुलेमान बहुत बड़े झूठे हैं और हदीस के नाम पर झूठ गढ़ते हैं, याह्या इब्न माइन भी इब्न सुलेमान को झुटा बताते हैं।[9]

यह बात काफी अजीब लगती है कि जिस व्यक्ति को हदीस स्वीकारने के मामले में इतने व्यापक रूप से अविश्वसनीय माना जाता है, [यहाँ तक के झुटा तक कहा गया है] उसे कुरआन के मामले में विश्वसनीय माना जा रहा है।

3. एकमात्र पूर्ण किर’आत (पाठ) जो रसूलअल्लाह (स.व) के वक़्त से प्रचलन में है और तभी से पढ़ी जाती रही है वह किर’आत अल्-आम्मह (the universal reading) है। वही किर’आत जो कुरआन के पूरा हो जाने के बाद रसूलअल्लाह (स.व) को पढ़ कर सुनायी गयी। यही वह किर’आत है जो रसूलअल्लाह (स.व) के साथियों में प्रचलित थी। अबू अब्द अल्-रहमान अल्-सुलामी (मृ.105 हि.)[10] कहते हैं:

“अबू बक्र, उमर, उस्मान और ज़ेद और सभी मुहाजिरीन और अंसार[11] की एक ही किर’आत थी, और सब किर’आत अल्-आम्मह ही पढ़ा करते थे। यही वह किर’आत है जो कुरआन के पूरा हो जाने के बाद रसूलअल्लाह (स.व) को उनके अंतिम वर्ष में जिब्राइल अमीन ने पढ़ कर सुनायी, ज़ेद इब्न साबित भी उस पाठ के समय (अर्ज़ अल्-अखिरा) मौजूद थे और यही वह किर’आत है जिस पर उन्होंने पूरी ज़िन्दगी लोगों को कुरआन सिखाया।”[12]

अब जहाँ तक कुछ उन जगहों की बात है जहाँ कुरआन को अलग किर’आत पर पढ़ा जा रहा है[13] तो यह पाठभेद रसूलअल्लाह (स.व) के बहुत बाद में उन लोगों में प्रचलित कर दिए गए हैं, जैसा कि इतिहास से पता चलता है कि नाफी की किर’आत तीसरी सदी हिजरी में उत्तर अफ्रीका में आधिकारिक तौर पर अपना ली गयी जब वहां मालिकी धर्मशास्त्र (फिकहा) का उदय हुआ।[14]

इस पूरे विश्लेषण से स्पष्ट है कि विभिन्न किर’आत (पाठ) जो कुछ जगह तफसीर की किताबों में पाई जाती हैं या कुछ जगह पर पढ़ाई जाती हैं उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता, यह तो हो सकता है कि वह रसूलअल्लाह (स.व) के साथियों द्वारा कुछ आयात के मात्र स्पष्टीकरण थे या फिर कुरआन की उपेक्षा करने के लिए मनगढ़ंत थे, यह जवाब शायद अब ना मिल पाये
परन्तु यह स्पष्ट है कि किर’आत अल्-आम्मह के सिवा किसी और किर’आत को कुरआन नहीं कहा जा सकता।

 

– शेहज़ाद सलीम
  अनुवाद: मुहम्मद असजद​​​​

 


[1] Singular and Plural
[2]. Verb structure (فعل)।
[3]. उदाहरणों के लिए देखें – मुहम्मद फाहद खारूफ़, अल्-मुयस्सर फी अल्-किर’आत अल अरबा, अशरा, सं-4, 2006।
[4]. isolate reports, जिस खबर में मुतवातिर के गुण ना हों, जिसे बहुत कम लोगों ने आगे प्रेषित किया हो और जिसके सही होने के बारे में विश्वास से ना कहा जा सकता हो।
[5]. ऐसा सिर्फ व्यापक हो गया है।
[6]. अबू अब्दुल्लाह बद्र अल्-दीन मुहम्मद इब्न बहादुर इब्न अब्दुल्लाह अल्-ज़र्कशी, अल्-बुरहान फी उलूम अल्-कुरआन, सं.2 भाग.1, 319।
[7]. हदीस की सनद की पड़ताल।
[8]. रसूलअल्लाह (स.व) के कथन, कार्य और स्वीकृति एवं पुष्टि की रिवायतों (उल्लेख परंपरा) को इस्लामी परिभाषा में 'हदीस' कहा जाता है।
[9]. अबू अल्-हज्जाज़ युसूफ इब्न अल्-ज़की अल्-मिज्ज़ी, तहज़ीब अल्-कमाल फी अस्मा’ अल्-रिजाल, सं.2 भाग-7, 13-15।
[10]. अल्-मिज्ज़ी,तहज़ीब अल्-कमाल, भाग-14, 410।
[11]. मुहाजिरीन -जो मक्के से प्रवास करके मदीने आये, अंसार – मदीने वाले।
[12]. अल ज़र्कशी, अल् बुरहान, भाग.1, 237।
[13]. उदाहरण के तौर पर ट्यूनीशिया में कुरआन का पाठ कालूँन (मृ.220 हि.) की किर’आत पर किया जाता है जो कि नाफी (मृ.169 हि.) के शिष्य थे, मोरक्को में वर्ष (मृ.197 हि.) कि किर’आत पर, यह भी नाफी के शिष्य थे, सूडान और यमन के कुछ हिस्सों में दूरी (मृ.246हि.) की किर’आत पर जो अबू-अम्र (मृ.154 हि.) के शिष्य थे।
[14]. हिन्द शल्बी अल्-किर’आत बी अफ्रीकिया सं.1, 223-235।